2 सितम्बर से शुरु हो रहे हैं सोलह श्राद्ध, सुख समृद्धि के लिए पितरों का मिलता है आर्शीवाद। आचार्य घनानंद कांडपाल, पूर्व प्रधानाचार्य


नैनीताल। लाइव उत्तरांचल न्यूज( धर्म—कर्म )

Acharya Pt. Ghananand Kandpal (Former Principal)


2 सितंबर यानि कल 18 गते भाद्र बुधवार से सोलह श्राद्ध शुरु हो रहे हैं। भारतीय परंपरा में सोलह श्राद्धों का विशेष महत्व माना जाता है। श्रद्धा भाव से पितरों का आवाह्न् करने पर पितर प्रसन्न् होते हैं और सुखी जीवन के लिए आर्शीवाद देते हैं। लाइव उत्तरांचल न्यूज ने सोलह श्राद्धों से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी व महत्व को लेकर आप सभी पाठकों को जानकारी देने का प्रयास किया है।

84 लाख योनि में जीवन ग्रहण करना उन योनियों में मनुष्य योनि में जन्म लेना श्रेष्ठ कहा गया है। आत्मा परमात्मा का एक अंश है हर शरीर में आत्मा का निवास रहता है।आत्मा अजर एवं अमर है शरीर नाशवान है। जन्म—मृत्यु ध्रुव सत्य है।

जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु ध्रुवं जन्म मृतस्य च
तषमाद परिहार्ये अर्थे न त्वं शोचितु मर्हसि।।
(अत: शरीर की समयावधि समाप्त होने पर आत्मा शरीर को छोड़कर परमात्मा के पास चली जाती है शरीर जमीन पर पड़ा रहता है)
मृतं शरीरं उत्सृज्य काष्ठ लोष्ठ क्षमं सुतो
विमुखा वान्धवायान्ति धर्मस्तदनुगच्छति।।

ऐसे समय में आत्मा दूसरे शरीर में प्रवेश कर मनुष्य का जन्म होता है। आत्मा एक नहीं कईं शरीरों को जन्म देती है। शरीर के भष्मीभूत करने के बाद पुत्र/पुत्री तथा कुटम्बीजन अन्त्येष्टि क्रिया में संलग्न हो जाते है। शरीर को मोक्ष मिले इस इच्छा से 12 दिन तक क्रिया संपन्न की जाती है।

मोक्ष एवं श्राद्ध— मृत शरीर के लिए कुटम्भी जन पुत्रादि मोक्ष हेतु कामना करते हैं। परन्तु कलियुग में मोक्ष दुर्लभ है। वह शरीर अपने पूर्व कार्यों के आधार पर अनेक योनियों में भटकता रहता है। अत: माता—पिता एवं पूर्वजों की स्मृति में श्राद्ध किया जाता है। इस श्राद्ध को करने से जीवन पुत्रादि पितृ ऋण से मुक्त होते हैं। तथा मृतात्माओं को योनि स्वरूप शान्ति प्राप्त होती है। जिस प्रकार अग्नि द्वारा देवताओं को आहूति प्राप्त होती है। उसी प्रकार कव्य एवं हव्य द्वारा पितरों को अन्न् एवं जल प्राप्त होता है। पितरों की शान्ति एवं प्रसन्नता हेतु श्राद्ध किया जाता है। मृत्यु के बाद श्राद्ध ही तो श्रद्धा है।

ये जीवा च येमृता ये जाता ये च यज्ञिया:
तेभ्यो धृत कुल्ये तु मधुधारा व्युन्दंती ।- (अथर्ववेद से)

श्राद्ध मृत लोगों का होता है। ​जीवित पितरों की सेवा आज्ञापालन तथा भरण पोषण किया जाता है। मृत्यु के बाद एक वर्ष में वार्षिंक श्राद्ध होता है। वास्तव में श्राद्ध से एक नवीन योनि उन पितरों को प्राप्त होती है। तब से वह श्राद्ध ग्रहण के अधिकारी बनते हैं।
श्राद्ध विधि – पूरे वर्ष में माता—पिता अर्थात पितरों का श्राद्ध दो बार किया जाता है। प्रथम मृत्यु की तिथि पक्षानुसार ग्राहय है। दूसरा पितृ पक्ष सोलह श्राद्धों में किसी भी दिन किया जा सकता है। ध्यान रहे माता जीवित हों तो पिता का श्राद्ध अमावस्या ​तक किसी भी दिन कर सकते हैं। यदि माता जीवित न हों तो माता का श्राद्ध नवमी तिथि में होना आवश्यक है। तब पिता का श्राद्ध नवमी से पहले करना चाहिए। उक्त तिथियों में किसी प्रकार का विलम्ब हो जाय तो अमावस्या तिथि को तर्पाणादि से पितरों को संतुष्ट करना चाहिए।
श्राद्ध का महत्व: – अपने पूर्वजों के साथ श्रद्धा का परिचय है श्राद्ध किन्तु कई विघटनों के कारण कईं समुदायों के कारण तथा कई प्रकार के सत्संगों में श्राद्ध को एक हास्य माना जा रहा है। जो नास्तिकता का परिचय है। बादशाह शाहजहां ने हिन्दुओं के इस तर्पण विधि के आगे​ सिर झुका दिया था और कहा –

एक पिशर तो अजब मुसलमानी
जिन्दा जान मब आब तरसानी
आफरी बाद हिन्दुवां हर वाब
मुर्दागारां देहन्द दायम आब।।

अत: इस प्रकार आर्य संस्कृति के अनुसार जीवित लोगों का सेवा सत्कार तथा मृत लोगों का श्राद्ध किया जाता है।

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अंग्रेज प्रो. एफ मैक्समूलर ने भारतीय संस्कृति में श्राद्ध को बहुत महत्व दिया और श्राद्ध विधि की सराहना की।

प्रेतं पितृश्रच निर्दिष्य भोज्यं यत्प्रियमात्मन: ।
श्रद्धया दीयते यत्र तत~श्राद्धं परिकीर्तितम।।
ऋग्वेद—सामवेद में श्राद्ध की प्रशंसा वर्णित है।

तर्पण – जल ही जीवन है अत: जीवित मनुष्यों की तरह मृत शरीरों को अर्थात मृत आत्मा को जल की आवश्यकता होती है। अर्थात उन्हें तृृप्त करने हेतु ऋषि मुनियों के साथ—साथ तर्पण किया जाता है। तर्पण में किसी भी मृतात्मा माता—पिता, चाचा, ताऊ, नाना—नानी, मामा—मामी, सास—ससुर मित्र, गुरु का नाम उच्चारित किया जाता है। किंतु श्राद्ध में मनुष्य तीन पीढ़ी तक पिण्डदान देने का अधिकारी होता है। अन्य लोगों को पिण्ड दान देने का अधिकार शास्त्र मर्यादा में नहीं है। वसु स्वरुप, रुद्र स्वरुप व आदित्य स्वरुप तीन रुपों में पितरों का स्मरण किया जाता है।
श्राद्ध पक्ष में विशेष नियम – श्राद्ध पक्ष पितृ ऋण कहा जाता है। इसे महालया पार्वण श्राद्ध कहते हैं। इन दिवसों में देव पूजा को महत्व न देकर पितृ पूजन को श्रेष्ठ माना है। युद्यिष्ठिर, भगवान श्रीराम तथा समस्त ऋषि मुनि, अन्य देवगण इन दिनों पितरों का आवाहन कर पितृ ऋण से मुक्त होते रहे हैं। मांस मदिरा का सेवन निषेद्य है। श्राद्ध करने वाले व्यक्ति को पहले दिन व्रत उपवास लेना चाहिए तब दूसरे दिन श्राद्ध करना श्रेष्ठ माना गया है। नवमी को केवल माता का श्राद्ध तथा पिता का श्राद्ध पहले प्रतिपदा से लेकर किसी भी दिन करना उत्तम है। अहंकार का त्याग कर नम्रता धारण कर तथा शांत मन से ही श्राद्ध करना चाहिए। श्राद्ध करने के बाद गौमाता को भोजन देना चाहिए। फिर पक्षी के निमित्त अन्न देना चाहिए। तब कुटम्भी जन एवं मित्रगणों के साथ भोजन करना उत्तम है। श्राद्ध न करने पर पितर आशा रहित हो जाते हैं।

यं माता—पितरौ कलेशं सहेते सम्भवे नृणाम।
न तस्या निष्कृति: कर्तु सक्यां वर्ष शतैरपि।।

भ्रामक धारणायें -शास्त्रों में मूल ग्रंथ निर्णय सिन्धु में कहा गया है कि गया एवं पुष्कर तीर्थों में श्राद्ध करने पर पितरों को मोक्ष प्राप्त होता है। यह सत्य है। परंतु शरीर छोड़ने पर ही आत्मा की 3 गति होती है।
प्रथम – शुभ कार्यों के फल स्वरुप संदेह रहित पुरुष की आत्मा मोक्ष पद को प्राप्त करती है। किन्तु हमें यह ज्ञान प्राप्त नहीं हो पाता कि कौन पितर मुक्त हो गया है। इसलिए श्राद्ध करते हैं। श्राद्ध कर्म का पुण्य फल कर्ता का प्राप्त होता है।
द्वितीय – जिनके पुण्य कर्म अधिक पाप कर्म कम हैं। वह चन्द्रमंडल के ऊपर अग्निख्वातादि पितरों के लोक में पहुंचते हैं। वेद मंत्रों का आवाहन करने पर ये पितर सूक्ष्मरुप से श्रद्धास्थल में आकर हवि पदार्थों से संतुष्ट हो जाते हैं। अत: श्राद्ध आवश्यक है।
तृतीय –जिन आत्माओं में पाप का संबंध अधिक मात्रा में है वे तत्काल वायु शरीर धारण कर यमलोक में जाते हैं। कर्मानुसार नई—नई योनियों में शरीर धारण करते हैं। पशु, यक्ष, सर्प, दनुज, मानव नहीं मालूम किस रुप में हैं। वे इन योनियों में शरीर धारण करते हुए श्राद्ध में दिये गये अन्न् से तृप्त होते हैं तथा श्राद्ध कर्ता कुटम्बी जनों से प्रसन्न होकर आर्शीवचन देते हैं।
पार्वण आवश्यक — तीर्थों में पिण्ड दान से मोक्ष की प्राप्ति कही गई। वहां पर पिण्ड बनाने के बाद श्राद्ध कर्ता को अपने घर में पितर पिण्ड बनाने की आवश्यकता नहीं होती। किन्तु तर्पण आवश्यक है। उनके नाम का भोजन पातली अवश्य देनी चाहिए। तात्पर्य यह है कि श्राद्ध कभी छोड़ना नहीं है। सदैव श्रद्धा विधि से अवश्य करना चाहिए। पितरों का गया, कुरुक्षेत्र, हरिद्वार, बद्रीकेदार में श्राद्ध करने से केवल पिण्ड नहीं बनाने का विधान है। किन्तु श्राद्ध न होने से श्रद्धा का नाश होता है। अत: पितरों की असंतुष्टि से गृह कलेश में वृद्धि होती है।

ऊं नमों भगवते वासुदेवाय नम:

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