भिटौलीः बहिन बेटी से जुड़ी अनूठी परंपराः जया जोशी

अल्मोड़ा। जया जोशी

व्हाट्सएप पर लाइव उत्तरांचल न्यूज के नियमित समाचार प्राप्त करने व हमसे संपर्क करने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें
https://chat.whatsapp.com/BhBYO0h8KgnKbhMhr80F5i

देवभूमि में लोक-संस्कृति व लोकपर्वों की कई अनूठी परंपराएं मौजूद हैं। हिन्दू कलेंडर के पहले माह चैत्रमास की भिटौली इनमें एक है। चैत्र प्रतिपदा के शुरू होने वाली देवी पूजा से पहले पहाड़ की देवी स्वरूपा बहिन बेटियों को इस मौके पर भेंट दी जाती है।
बहिन बेटियां शादी के बाद ससुराल जाती हैं और मायके की उनके पास केवल याद भर रह जाती है। ससुराल में दायित्व निभाने में व्यस्त हो चुकी बहिन बेटी को साल मेें इस मौके पर उम्मीद रहती है कि मायके से भिटौली आएगी। मायके से पिता अथवा भाई की ओर से उसे कुछ नेग दिया जाता है। यूं तो पहाड़ में चैत के महिने को काला महिना माना जाता है। इस माह में शादी विवाह जैसे शुभकार्य वर्जित रहते हैं। लेकिन बहिन बेटी को भिटौली की परंपरा निभाई जाती है। हालांकि शादी के पहले साल भिटौली शायद इसी कारण से चैत के बजाय बैशाख के महिने में दी जाती है।
भिटौली का अर्थ भेंट (गिफ्ट) या मुलाकात से है। स्थानीय संस्कृति में पली बढ़ी ससुराल गई बहिन बेटी बचपन से अपने मां की चैत के महिने में भिटौली आती देखती रहती है। शादी के बाद उसे भी साल में एक बार भिटौली का इंतजार रहता है। एक जमाने में आने जाने के साधन इतने सुलभ नहीं होते थे। बहिन बेटियों को मायके जाने का मौका कम ही मिल पाता था। ऐसे में भिटौली का अधिक इंतजार रहता था। भिटौली में आने वाले पूरी पकवान व मिठाई आदि को पूरे गांव में बांटा जाता था।हालांकि अब दौर बदला है और लोग भिटौली में पकवान आदि ले जाने से परहेज करते हैं। इसके स्थान पर मिठाई व फल रूपये कपड़े आदि ने ले लिया है। लोग पहले मनीआ़डर्र भी भेजते थे ऑन लाइन बैंकिंग के जमाने में खाते में धनराशि देने का चलन हो गया है। बेटी के मायके से जुड़ी यह परंपरा मजबूत पारिवारिक रिश्तों की मिशाल कही जा सकती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

%d bloggers like this: