सरकारी विभागों में रिक्त पदों पर तत्काल नियुक्ति प्रक्रिया शुरू हो, विधि आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष एडवोकेट तिवारी ने सरकार से की मांग

एडवोकेट दिनेश तिवारी

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नैनीताल। लाइव उत्तरांचल न्यूज


विधि आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष राज्यमंत्री रहे एडवोकेट दिनेश तिवारी ने कहा है कि उत्तराखंड राज्य गठन दो दशक के बाद भी बेरोज़गारी, शिक्षा, स्वास्थ्य के क्षेत्र में अपेक्षित कार्य नहीं हुआ है। वर्तमान कोरोनाकाल में बेरोजगारी में खासा इजाफा हुआ है। उन्होंने प्रदेश की त्रिवेंद्र रावत सरकार से इसमें तत्काल राहत देने के लिए स्वरोजगार के लिए विशेष पहल के साथ ही राज्य में सरकारी व अर्धसरकारी विभागों में रिक्त पदों पर तत्काल नियुक्ति प्रक्रिया शुरू करवाने की मांग की है।


एडवोकेट तिवारी ने यहां जारी बयान में कहा है कि उत्तराखंड की राजनीति में बेरोज़गारी, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे मुद्दे वर्तमान भी प्रभावी बने हुए हैं। यही नहीं 2022 के विधानसभा चुनाव में ये ही प्रमुख मुद्दे प्रमुखता में रहेंगे। उन्होंने कहा है कि यूं तो देश के इतिहास में  बहुत कम चुनाव ऐसे हैं जिसमें बेरोज़गारी, स्वास्थ्य व शिक्षा चुनावी मुद्दे बने हो। लेकिन बिहार विधनसभा के हालिया चुनाव ने यह साबित किया है कि बेरोज़गारी का मुद्दा चुनावों की तस्वीर बदल सकता है।


तिवारी के कहा है कि कोरोना महामारी के कारण एक अनुमान के अनुसार करीब 25 लाख उत्तराखंडी युवाओं की नौकरियां गई हैं। ठेकों पर काम बंद हुए और दिहाड़ी मजदूरों को भी काम से हाथ धोना पड़ा है। कहा कि अगर राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो करीब 12 करोड़ लोगों को रोज़गार से बाहर होना पड़ा। आंकड़ों के अनुसार उत्तराखंड में बेरोज़गारी की औसत दर 19-20 फीसदी रही है लेकिन कॉरोना काल में यह बढ़कर 45-50 फीसदी हो गई है। इसे एक भयावह स्तिथि बताते हुए आगे कहा कि कृषि, पर्यटन, आईटी, शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग, ट्रांसपोर्ट आदि अनेक महत्वूर्ण क्षेत्रों में 20 लाख रोजगार के अवसर पैदा करने की तत्काल ज़रूरत है। मौजूदा समय में सरकारी नौकरियों और रोज़गार के अवसर बेहद सीमित होते जा रहे हैं।

उन्होंने आरोप लगाया कि त्रिवेंद्र रावत सरकार के समय राज्य की उत्पादक क्षमता सबसे अधिक प्रभावित हुई है। रुद्रपुर, सितारगंज, बाजपुर, काशीपुर, देहरादून, सेलाकुई, हरिद्वार आदि क्षेत्रों में खुले उद्योग भी वर्तमान में तालाबंदी के रास्ते पर है। कहा कि औद्योगिक  मंदी व कोरोनाकाल में तराई में स्थापित उद्योगों से लगभग  60 हज़ार नौकरियां चली गई। राज्य सरकार पर कृषि क्षेत्र की उपेक्षा का आरोप लगाते हुए कहा कि – सिंचाई योजनाओं का पुर्नगठन व नयी व्यवस्था के लिए कोई वित्तीय प्रबंध नहीं होने के कारण पर्वतीय क्षेत्र के किसानों की उत्पादक क्षमता 80 प्रतिशत घट गई है।

आरोप लगाया कि सरकार की राज्य के पहाड़ी जिलों में शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग, कृषि, पर्यटन में निवेश नहीं करने के कारण पर्वतीय राज्य के समर्थ ठेकेदारों, इंजीनियरों, डॉक्टरों, व्यापारियों का एक बड़ा तबका पहाड़ छोड़ के चला गया है। कहा कि उत्तराखंड सबसे अधिक युवा आबादी वाले राज्यों मे से एक है, लेकिन राज्य की इस 60 प्रतिशत युवा आबादी को रोज़गार देने कि कोई नीति राज्य सरकार के पास नहीं है। आरोप लगाया कि राज्य बनने के बाद गरीबी में जीने वालों का प्रतिशत बढ़कर 52 प्रतिशत हो गया है। कहा कि राज्य का पर्वतीय हिस्सा गरीबी, बेकारी का अधिक सामना कर रहा है। इसे पलायन की बड़ी वजह बताते हुए कहा कि देश में सबसे अधिक पलायन पहाड़ी इलाकों से ही होता है और हो रहा है।

कहा कि समय रहते यदि पहाड़ों में कृषि, बागबानी, सिंचाई,शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन पर अधिक ध्यान केंद्रित किया होता तो कोरॉना काल में वापस लौटे युवा पुनः पलायन करने को मजबूर नहीं होते। उन्होंने त्रिवेंद्र रावत सरकार से मांग की कि राज्य में सभी विभागों में रिक्त पदों पर तत्काल नियुक्तियां शुरू करें और कृषी, शिक्षा, स्वास्थ्य के बजट को तिगुना करें। कहा कि प्रदेश  सरकार को रोज़गार सृजन के उपायों के प्रति बहुत गंभीर होने की ज़रूरत है और आरोप लगाया कि इस मोर्चे कर सरकार का काम फिलहाल तो काफी निराशाजनक ही दिखाई दे रहा है।

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