आइये जानें सोर की हिलजात्रा के बारे में, कैसे चार पहाड़ी भाईयों ने जीता नेपाली राजा का दिल और कैसे हुई उत्तराखण्ड में हिलजात्रा की शुरुआत— नीरज कुमार जोशी, नैनीताल।

नैनीताल। नीरज कुमार जोशी


देवभूमि उत्तराखंड में लोकपर्व आस्था, विश्वास, रहस्य और रोमांच का प्रतीक हैं। यहां मनाये जाने वाले पर्व जहां हमारी ए​तिहासिक सांस्कृति विरासत व मूल्यों के प्रतीक हैं वहीं यह एक—दूसरे को एकता के सूत्र में बांधने का भी कार्य करते आ रहे हैं। ऐसा ही एक पर्व है प्रदेश के सीमांत जनपद पिथौरागढ़ की ऐतिहासिक हिलजात्रा। हिलजात्रा को कृषि पर्व के रुप में भी मनाया जाता है। हिलजात्रा सोर, अस्कोट और सीरा परगना क्षेत्र में मनाया जाता है। आइये जाने इस देवभूमि उत्तराखण्ड के इस ऐतिहासिक लोक पर्व के बारे में।


उत्तराखंड का प्रमुख मुखौटा नृत्य नाम से मशहूर कुमौड़ की हिलजात्रा पूरे देश में प्रसिद्ध है। हिलजात्रा जितनी प्रसिद्ध है उतनी ही प्रसिद्ध है इसके पीछे छिपी कहानियां। प्रदेश के सीमांत जनपद पिथौरागढ़ के सोर घाटी की पहचान बन चुका हिलजात्रा लाने का श्रेय चार वीर महर भाईयों को जाता है। कहते हैं कि सदियों पूर्व चारों भाई अपनी वीरता के बदले नेपाल से पुरस्कार स्वरूप हिलजात्रा को सीमांत जनपद लेकर आए थे।
दरअसल हिलजात्रा पर्व का संबंध नेपाल से है। कहा जाता है कि नेपाल में प्रचलित इंद्रजात्रा के समय चारों महर भाई कुंवरसिंह कुरमौर, चहज सिंह, जाखन सिंह व बिणसिंह यात्रा देखने नेपाल पहुंचे थे। नेपाल में होने वाले इस उत्सव में भैषें की बलि देने की प्रथा प्रचलित थी। ​खास बात यह थी कि एक प्रयास में ही बलि देनी थी। इस पर जब स्थानीय निवासी जब हिम्मत नहीं जुटा सके तो महर भाईयों ने राजा इसे इसकी अनुमति मांगी। कहते हैं कि एक भाई ने ऊंचे स्थान पर चढ़कर भैषे को घास दिखाई और जब उसने घास खाने के लिए मुंह ऊपर किया तो दूसरे भाई ने नीचे की तरफ से खुखरी से वार कर भैषे की गर्दन उड़ा दी। तब राजा ने प्रसन्न होकर पुरस्कार मांगने को कहा। महर भाईयों ने ईनाम में राजा से इस उत्सव को अपने क्षेत्र में मनाने का अनुरोध करते हुए इस उत्सव में प्रयोग होने वाले पौराणिक मुखोटे को साथ ले जाने की इच्छा की। प्रसन्न राजना ने उनका अनुरोध मान लिया। महर बंधु उन मुखोटों को लेकर कुमौड़ पहुंचे और आठूं पर्व के दूसरे दिन इस उत्सव को मनाया। तब से हर साल यहां पर यह उत्सव मनाया जाता है। सौर घाटी के लोग इस उत्सव का बेसब्री से इंतजार करते हैं।

हिलजात्रा में लखियाभूत से आर्शीवाद लेने पहुंचते हैं लोग

नैनीताल। लोग भूत से आर्शीवाद लेने पहुंचे ऐसा शायद ही किसी की कल्पना में आता होगा। लेकिन ऐतिहासिक हिलजात्रा में ऐसा ही नजारा देखने को मिलता है। यहां लखिया भूत लोगों को आर्शीवाद देते हुए यात्रा का खास आकर्षण बनता है। घंटों तक चलने वाले हिलजात्रा पर्व का समापन उस लखिया भूत के आगमन के साथ होता है, जिसे भगवान शिव का गण माना जाता है। लखिया भूत अपनी डरावनी आकृति के बावजूद हिलजात्रा का सबसे बड़ा आकर्षण है। जो लोगों को सुख,समृद्दि और खुशहाली का आशीर्वाद देने के साथ अगले साल लौटने का वादा कर चला जाता है।

कृषि पर्व के रुप में है हिलजात्रा की पहचान
नैनीताल। पर्व का आगाज भले ही महरों की बहादुरी से हुआ हो, लेकिन अब इसे कृषि पर्व के रूप में मनाया जाने लगा है। हिलजात्रा में बैल, हिरन, चीतल और धान रोपती महिलाएं यहां के कृषि जीवन के साथ ही पशु प्रेम को भी दर्शाती हैं।

नोट: आलेख को जानकारियों के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। फिर भी त्रुटियां होना संभव है। सुझाव सादर आमंत्रित है।
— टीम लाइव उत्तरांचल न्यूज

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