बेटे की पिता को साहित्यिक श्रद्धांजलि, ललित मोहन रयाल की ‘कारी तू कब्बि ना हारि’


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नैनीताल। लाइव उत्तरांचल न्यूज

सामान्य घरों से ऊंचे ओहदे पर पहुंचने के बाद लोग अपने अतीत को याद करने से परहेज करते हैं। हमारे पहाड़ में यह अक्सर देखने में आता रहा है। लेकिन उत्तराखंड पीसीएस के पहले बैच के टॉपर रहे ललित मोहन रयाल इस मिथक के उलट कुछ अलग मिजाज के हैं।

उऩ्होंने गत वर्ष स्वर्गवासी हुए अपने पिता स्व. मुकुंद राम रयाल की याद को चिर स्थायी करने के लिए ‘कारी तू कब्बि ना हारि’ पुस्तक लिख कर अपने अलग मिजाज को साबित किया है। आंचलिक बोली गढ़वाली व हिन्दी में लिखी यह रोचक पुस्तक अगले माह यानि फरवरी में पाठकों के बीच होगी।


ललित मोहन रयाल की ईमानदार व कुशल अधिकारी के तौर पर पहचान है वहीं उन्होंने अपनी लेखनी के बल पर साहित्य जगत में सम्मान जनक स्थान हासिल किया है। उनकी खड़क माफी की स्मृतियों से व अथश्री प्रयाग कथा कृतियों को पाठकों ने हाथों हाथ लिया है। इनमें भी उन्होंने अपने बचपने से लेकर प्रयाग में सिविल सेवा की तैयारियों के दौर का बड़ा ही सजीव चित्रण किया है।


रयाल के पिता स्व मुकुंद राम रयाल को दिवंगत हुए फरवरी में एक साल होने जा रहा है। इस बीच उऩ्होंने पिता को श्रद्धांजलि देते हुए उनकी जीवनी को पुस्तकाकार किया है। ‘कारी तू कब्बि ना हारि’ माने कर्मयोगी तू कभी हार नहीं सकता नाम से इसका प्रकाशन होने जा रहा है। उन्होंने बताया है कि उनके पिता हिन्दी के शिक्षक रहे और उनका सारा जीवन भाषा को समर्पित रहा।

उनके जीवन दर्शन से प्रेरित होकर यह प्रयास किया गया है। पिता ने हमेशा गढ़वाल के दूर दराज में अपनी सेवा की थी। रयाल ने इस कृति में हिन्दी में लिखते हुए गढ़वाली शब्दों का उपयोग किया गया है। हालांकि पुस्तक के अंत में उपयोग किए गए गढ़वाली बोली का हिन्दी रूपांतर भी दिया गया है।


रयाल का मानना है कि किसी भी कृति में स्थानीय बोली का उपयोग उसमें जान भर देता है। रयाल उदाहरण देते हुए बताते हैं कि मैला आंचल में मगही हट जाय अथवा राग दरबारी से अवधि का लहजा हटा दिया जाय तो उसका महत्व नहीं रह जाएगा।

रयाल के अनुसार भारत में 1500 से अधिक बोलियां हैं। जोकि हिन्दी से मिलती जुलती हैं। क्षेत्र विशेष के लेखकों का द्वारा इनका उपयोग किया जाता रहा है। ‘कारी तू कब्बि ना हारि’ में गढ़वाली बोली का उपयोग किया गया है। उम्मीद है कि पाठकों को यह प्रयोग रोचक लगेगा।

ललित मोहन रयाल


हमारा मानना है कि ललित मोहन रयाल की अपने स्व. पिता को लेकर दी गई यह साहित्यिक श्रद्धांजलि शास्त्रों में वर्णित सुपुत्र की परिभाषा सुपुत्र कुलदीपकः को भी साकार करती है । कहा गया है:-


प्रदोषे दीपकश्चन्द्रः प्रभाते दीपको रविः।
त्रैलोक्ये दीपको धर्मः सुपुत्र कुलदीपकः॥
(रात्रिकाल में प्रकाश प्रदान करने वाला दीपक चन्द्रमा है, दिन में दीपक सूर्य है, तीनों लोकों का दीपक है धर्म और सुसंस्कारवान् सुपुत्र कुल का दीपक होता है।)

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