:कल्याण की देवी मां भद्रकाली: आइये जानें बागेश्वर ​के कांडा स्थित मां भद्रकाली मंदिर की महिमा, सदियों से रहा है आस्था का केंद्र — नीरज कुमार जोशी

नैनीताल। नीरज कुमार जोशी

चैत्र नवरात्र शुरु हो चुके हैं। देश भर में मां के मंदिरों में नवरात्र की धूम है। देवभूमि उत्तराखण्ड पर मां जगदम्बा की विशेष कृपा दृष्टि रही है। यहां स्थित पौराणिक मंदिर व भक्तों का अटूट आस्था सदियों से इसकी गवाही देते आ रहे हैं। मां का एक ऐसा ही अनुपम धाम स्थित है बागेश्वर जिले के कांडा तहसील में। यहां भद्रकाली गांव स्थित माता भद्रकाली कल्याण की देवी के रुप में सदियों से भक्तों का कल्याण करती आ रही हैं। चैत्र नवरात्र समेत वर्ष भर यहां भक्तजन मां के दर्शनों को पहुंचते हैं। मां भद्रकाली मंदिर समिति ने मंदिर के इतिहास , पौराणिक व धार्मिक महत्व को सहेजने का बेहद सुंदर प्रयास किया है। वरिष्ठ पत्रकार रमाकांत पंत की ओर से संपादित व समिति अध्यक्ष योगेश पंत की ओर से प्रकाशित इस पुस्तक में पंडित गंगा प्रसाद जोशी समेत अनेक विद्ववत जनों ने मां की महिमा को बेहद सुंदर ढंग से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। हम सभी का आभार जताते हुए प्रकाशित पुस्तक की सहायता से मंदिर से जुड़ी जानकारियों को ससम्मान आप तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं—

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माता भद्रकाली

भद्रकाली – भद्र+ काली अर्थात भद्र (कल्याण/शुभ) करने वाली माता पराम्बा भगवती का काली स्वरूप ही भद्रकाली है। भद्रकाली का उल्लेख हिन्दु पौराणिक महाकाव्य महाभारत में हुआ है। महाभारत शान्ति पर्व के अनुसार यह पराम्बा भगवती के कोप से जटाधारी शिव की जटा से उत्पन्न दक्ष-यज्ञ विध्वसंक देवी थी।
श्रीमद भागवत पुराण के अनुसार- माता देवी के अष्टम गर्भ अर्थात साक्षात नारायण स्वरूप भगवान श्रीकृष्ण को गोकुल छोड़कर उसके स्थान पर जिस कन्या को वसुदेव मथुरा लाये थे उस योगमाया को जैसे ही कंस ने शिला पर पटका तो वह अष्टभुजी भद्रकाली बनकर आकाश मार्ग से उड़कर चराधाम में शक्ति रूप में विराजित हो गई। यही माता पराम्बा का वही विद्या अधिष्ठात्री स्वरूप है जिसकी विशेष अनुकम्पा से कालीदास जैसे महान विद्वान का प्रादुर्भाव हुआ था। इसी माता भद्रकाली की विशेष अनुकम्पा से इस युग में भी प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से अनेक महा विद्वानों का प्रादुर्भाव हुआ है। ऐसी मान्यता है कि इस विद्या की अधिष्ठात्री देवी की अनुकम्पा से मूक व्यक्ति भी परम विद्वता को प्राप्त कर लेता है।
एक मान्यता के अनुसार जब भगवान शिव माता सती के देह को लेकर विहवल से इधर-उधर घूम रहे थे। उस समय भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से माता के शरीर के अनेक टुकड़े कर दिये और ये अंग जहां-जहां भी भी धरती में गिरे वहां शक्ति-स्थल बन गए और उसी समय माता का दक्षिण गुल्फ यानि कि घुटने का निचला हिस्सा इस स्थल पर गिरने से यह शक्ति पीठ बन गया। तभी से यह शक्ति पीठ भद्रकाली पीठ के नाम से विराजित है।

स्वयंभू पिंडी स्वरूप में विराजित है माता

बागेश्वर के कांडा स्थित मां भद्रकाली पीठ एवं गुफा स्थल पूर्ण रूप से प्राकृतिक है। मन्दिर के बाहरी ढांचे को छोड़कर कुछ भी मानवीय नहीं है। मां भद्रकाली पूर्ण रूप से वैष्णवी स्वरूप है। मां भद्रकाली को ब्रहम्चारिणी के नाम से भी जाना जाता है। तीनों स्वरूपों की पूजा होने के कारण यह परम वैष्णवी स्थान माना जाता है। कुछ स्थान स्वयंभू स्वरूप एवं ज्योतिर्लिंगों के रूप में आदि काल से लिंग स्वरूप या ज्योतिपुंज के रूप में पूजे जाते हैं। शक्ति की पूजा स्वरूप में मां सरस्वती, माता लक्ष्मी व माता काली के अलग रूपों में भक्त विद्वान योगी लोंगों द्वारा पूजा की जाती है। लेकिन भारत वर्ष में एक या दो स्थान ही ऐसे हैं जहां पर शक्ति के तीनों के स्वरूपों की पूजा एक ही स्थान पर स्वयंभू रूप यानि लिंग स्वरूप में स्थित हैं। आदि काल से उनकी पूजा उपासना की पंरपरा चली आ रही है। माता भद्रकाली के मंदिर मां के तीनों स्वरूपों महाकाली, महालक्ष्मी व महासरस्वती की पूजा की जाती है। यहां पर भक्त श्रद्धापूर्वक जो भी मनोकामना लेकर आते हैं माता की कृपा से उनकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है।

मां भद्रकाली की एतिहासिक दिव्य व रहस्यमय गुफा


नैनीताल। मां भद्रकाली मंदिर स्थित एक रहस्यमय गुफा है। गुफा के ऊपर माता का मंदिर स्थित जबकि नीचे नदी बहती है। प्राचीन काल में यह स्थल सिद्धि प्राप्ति हेतु अनेक महान तपस्वियों की तपःस्थली रही है। इस शक्ति पीठ के विषय में कहा जाता है कि यहां पर पराम्बा मां भगवती का साक्षात निवास है। यहां पर यदि कोई साधक साधना करे तो सबसे शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त होती है। ऐसा स्वंय सिद्ध है।
इस स्थान पर सभी धार्मिक अनुष्ठान, पूजा, कथा पुराण, व्रतबंध, नवरात्रि व्रत पूर्ण निष्ठा से अनवरत चलते रहते हैं। मंदिर में आचार्य पद खन्तोली के पंत लोगों को पुजारी का पद भद्रकाली गांव के जोशी लोगों को दिया गया है। भद्रकाली गांव के जोशी परिवार नित्य पूजा व भोग लगाकर आदि शक्ति मां भद्रकाली की नियमित पूजा करते आ रहे हैं। माता भद्रकाली मंदिर की गुफा से एक नदी निकलती है जिसको भद्रा नदी या भद्र-गंगा के नाम से जाना जाता है। जो मंदिर के निकट पहाड़ से निकल कर मंदिर परिसर के नीचे से लगभग 250 मीटर प्रवाहित होती रहती है। जिस कारण एक प्राकृतिक गुफा का निर्माण हुआ है जो कि हजारों वर्षों पुरानी है। इस गुफा के अंदर अनेक प्रकार की आकृतियां(लिंगों) का निर्माण हुआ है
गुफा में एक कुंड बना हुआ है जिसमें बाहर से आने वाले यात्री स्नान करते हैं। प्राचीन मतानुसार इस कुंड में स्नान करने से दैवीय भौतिक बाधाओं का निवारण हो जाता है। यहीं पर मां के चरण स्थान हैं यहां पर मां के चरणों की पूजा आराधना के बाद भक्त छोटी गुफा जो कि मंदिर परिसर के शक्ति पिंडों के ठीक नीचे स्थित है, भगवान भोले शंकर के दर्शन के लिए जाते हैं। यहां पर भगवान शिव की मूर्ति ध्यानस्थ अवस्था में स्थित है। इस गुफा के अंदर एक ओर भगवान शिव दूसरी ओर गुफा है। जो हजारों सालों से प्राकृतिक रूप में निर्मित है, जो भिन्न-भिन्न रूपों में दिखाई देती है। जिनका अवलोकन कर यात्री आंनद से भाव-विभोर हो जाते हैं।

मनमोहक है मां का यह धाम

भद्रकाली मन्दिर उत्तराखण्ड राज्य के बागेश्वर जनपद में स्थित है। जनपद मुख्यालय से यह 30 किमी पूर्व में पहाड़ की मनमोहक वादियों के बीच स्थित है। प्रायः माता के मंदिर एवं शक्ति पीठ ऊंची पहाड़ियों में स्थित होते हैं। इसके उलट माता का यह धाम चारों ओर से शिखरों के बीच घाटी में स्थित है। खास बात यह है कि इन शिखरों पर धौलीनाग, फेणीनाग, बेरीनाग व वासुकी आदि नाग देवताओं के मंदिर स्थित विराजमान हैं। मंदिर परिसर चारों ओर से हरे-भरे पेड़ों से घिरा हुआ है। मंदिर परिसर स्थित प्राकृतिक सुंदरता यहां आने वाले परम सुख की अनुभूति कराते हैं।

विश्वाधार रूप मे ध्यानस्थ है भगवान शिव

माता भद्रकाली के मंदिर की यह विशेषता है कि यहां गुफा में भगवान शिव विश्वाधार रूप में ध्यानस्थ गुफा में स्थित हैं। ऊपर माता जगदम्बा विश्वेश्वरी बनकर तीनों रूपों में माता सरस्वती ज्ञान रूप, माता लक्ष्मी सदसंपत्ति, माता काली पुरूषार्थ एवं जननी रूप में स्थित है। इस स्थान पर शिव और शक्ति का सम्मिलित स्वरूप है, जो एक-दूसरे के आधार रूप में है। मां भद्रकाली तीनों रूपों में आने वाले भक्तों, दर्शनार्थियों, यात्रियों के शारीरिक, दैवीय आपदाओं का निवारण करती हैं।

महान संतो का तपस्थली रही है माता की यह पीठ

माता भद्रकाली शक्ति पीठ प्राचीन काल से ही तपस्वी संतों की तपस्थली रही है। तपस्वी लोगों को यहां सुरम्य स्थान मिला वहीं तपस्यालीन हो गये। शांडिल्य, पंतजलि, बाल्मिकी आदि महान ऋषियों के यहां तप करने के कथानक मिलते हैं। यहां उच्च विधान के अनुसार ही वर्तमान समय में पूजा अर्चना का नियम चला आ रहा है। यहां प्रतिदिन माता को भोग लगाया जाता है। मान्यता है कि यहां की गई साधना कभी भी निष्फल नहीं होती और सबसे शीघ्र फलदायी होती है।

जब माता भद्रकाली ने चूर किया भद्र गंगा का अभिमान

नैनीताल। मान्यता है कि एक बार भद्र गंगा को अपनी शक्ति व प्रचंड वेग पर अभिमान हो गया था। जिस कारण उसने माता भद्रकाली को ही ललकार दिया कि मेरी शक्तिव प्रचंड वेग का सामना करने का सामर्थ्य इस त्रिलोकी में किसी में भी नहीं है। जो भी मेरे समक्ष आता है उसे में अपने प्रचण्ड वेग से बहा ले जाती हूं। तब माता भद्रकाली परम्बा ने कहा ठीक है, कैसी प्रचण्ड शक्ति है तुम्हारी इसका साक्षात्कार मुझे भी कराओ। कहा जाता है कि तब भद्र-गंगा गर्जना करती हुई प्रचंड वेग से सब कुछ बहाती हुई इस स्थल पर पहुंची तो माता पराम्बा भद्रकाली ने अपने दोनो पैरों के बीच से भद्र-गंगा को निष्कासित करके उसका अभिमान समाप्त किया था। यहीं गुप्त स्थल गुफा स्थान बना। ऐसी भी मान्यता है।

माता भद्रकाली के सौभाग्यदायिनी ग्यारह नाम

चिन्तामणि काली
स्पर्शमणि काली
सन्ततिप्रदा काली
सिद्धि काली
दक्षिण काली
कामकला काली
हंस काली
गुह्य काली
शमशान काली
महाकाली
भद्रकाली

नोट: आलेख में मौजूद जानकारियों को सावधानी पूर्वक प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। फिर भी त्रुटि होना संभव है। आप अपने सुझाव या अपनी रचनाओं को हम तक 8979279711 व 9412403532 पर व्हाटसेप मैसेज के माध्यम से पहुंचा सकते हैं। हम इन्हें प्रकाशित करने का प्रयास करेंगे। जय माता भद्रकाली।

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