बाघों की बढ़ती तादात पर्यावरण के लिए सकारात्मक संदेश, उत्तराखंड में 12 सालों में दोगुने से अधिक हुई आबादी – जगदीश जोशी, वरिष्ठ पत्रकार, नैनीताल


जगदीश जोशी, वरिष्ठ पत्रकार, नैनीताल

फोटोः अंतररष्ट्रीय छायाकार पदमश्री अनूप साह ने यह फोटो वर्ल्ड टाइगर दिवस पर विशेष रूप से शेयर की है


साल में 29 जुलाई को मनाए जाने वाला विश्व बाघ दिवस( International tiger day) इस बार देश के लिए सकून लेकर आया है। बाघों की बढ़ती तादात को पर्यावरणविद् प्रकृति के लिए शुभ संकेत मान रहे हैं। उनका कहना है कि प्राकृतिक आवास के लिए उपयुक्त वातावरण मिलने से ही जिम कार्बेट नेशनल पार्क में बाघों की तादात बढ़ी है उत्तराखंड में जहां 2006 में कुल 178 बाघ थे वहीं 2018 में 442 हो गए हैं। देश में 2006 के बाद बाघों की कुल आबादी में इस बीच 1556 का इजाफा हुआ है। इनकी तादात 1411 से बढ़ कर 2967 हो गई है।
केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने मंगलवार को इसका ब्यौरा जारी किया। उन्होंने बताया कि दुनिया में पाए जाने वाले बाघों के 70 प्रतिशत आबादी हमारे देश में रहती है। वर्ल्ड टाइगर डे की पूर्वसंध्या पर जारी इस रिपोर्ट में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण की देश में बाघों के परिदृश्य से संबंधित बाघों के आकलन का विवरण भी शामिल है। प्राधिकरण ने देश के बाघों के आवास को पांच भागों में बांटा है। इसके पहले भाग में  शिवालिक-गंगा के मैदानी इलाके में रखा है। इसमें उत्तराखंड, उप्र व विहार शामिल हैं। यहां बाघों की तादात पिछले 12 सालों में दोगुने से अधिक हुई है। 2006 में इस इलाके में 297 बाघ थे तो वहीं 2018 में इनकी तादात 646 हो गई है। इसमें तेजी के वृद्धि वाला क्षेत्र उत्तराखंड है।  दूसरे भाग में केंद्रीय व  पूर्वी भारत का इलाका रखा गया है। यहांं आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, मप्र, महाराष्ट्र, उड़ीसा , झारखंड व राजस्थान शामिल हैं। इस इलाके में 2006 में बाघों की कुल तादात 601 थी जोकि 2018 में 1033 हुई है। इस इलाके में वर्तमान में देश में सबसे अधिक बाघ वाला मप्र भी शामिल है। यहां 2006 में जहां 300 बाघ थे वहीं 2018 में 526 हो गए हैं। देश के पश्चिमी इलाके के राज्यों को बाघ की दृष्टि तीसरे जोन में रखा गया है। इनमें कर्नाटक, केरला, तमिलनाडु व गोवा शामिल हैं। इस क्षेत्र में 2006 में 412 थे जोकि 2018 में बढ़ कर 981 यहां बेहतर वृद्धि दर्ज करते हुए केरल में 46 से 190 तथा तमिलनाडु में तादात 76 से 264 पहुंची है। जबकि गोवा में 2018 में केवल 3 बाघ मौजूद बताए गए हैं।  चौथा इलाका देश के पूर्वोत्तर व ब्रह्मपुत्र क्षेत्र का बनाया गया है। इसमें देश के असम, अरुणांचल प्रदेश, मिजोरम व नागालेंड के अलावा पश्चिम बंगाल का उतरी क्षेत्र रखा गया है। इस इलाके में 2006 में बाघों की कुल आबादी 100 थी जोकि 2018 में 2019 हो गई है। यहां भी आबादी में दोगुनी से अधिक बढौत्तरी हुई है। सुंदरवन इलाको को इस सूची में अलग से रखा गया है। यहां पहली गणना 2010 में हुई थी यहां बाघों की तब आबादी 70 थी जोकि 2018 में 88 हो गई है। इधर पर्यावरण के लिए चिंता रखने वाले लोगों के लिए बाघों की बढ़ती तादात सकून देने वाली है। पर्यावरणविद् व प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो.अजय रावत का कहना है कि कार्बेट रिजर्व में इनकी तादात बढ़ने से साफ है कि प्राकृतिक आवास में अनुकूल परिस्थिति बन रही है। वहीं प्रो. रावत का कहना है कि भले ही हमने उप्र से अलग उत्तराखंड बना लिया है लेकिन बाघों के लिए राज्य की सीमा मायने नहीं रखती है। आज भी दोनों प्रदेशों के बढ़े हिस्से में बाघ स्वच्छंद विचरण कर रहे हैं।  
विश्व टाइगर दिवसः विश्व बाघ दिवस मनाने की शुरूआत 2010 से हुई है। बाघ के रिहायस वाले देशों ने 29 जुलाई को एक समझौते में हस्ताक्षर किए थे। रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में हुए इस सम्मेलन के अनुसार संबंधित देशों ने अपनी सीमा में  2022 तक बाघों की तादात दोगुना करने का संकल्प लिया था। इस बार इसको एक दशक पूरा हो रहा है।

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