प्रताप भय्या राजनेता से अधिक शिक्षाविद् के बतौर याद किए जाएंगे , 10 वीं पुण्य तिथि पर विशेष- भूपेंद्र मोहन रौतेला ,वरिष्ठ पत्रकार नैनीताल

नैनीताल। लाइव उत्तरांचल न्यूज

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प्रताप भय्या राजनेता से अधिक एक शिक्षाविद् के तौर पर याद किए जाएंगे। उनकी 23 अगस्त यानि आज 10वीं पुण्य तिथि है। प्रताप भय्या ने शिक्षा के क्षेत्र में अलख जगाने के साथ ही समाज में सर्व-धर्म-संभाव के लिए भी समर्पित होकर कार्य किया। इसी लिए लोग उन्हें गरीबों का मसीहा, मार्ग दर्शक व समाज का सच्चा पथ प्रदर्शक के तौर पर याद करते हैं।
प्रताप भय्या का बचपनः प्रताप का जन्म नैनीताल जिले के ओखलकांडा ब्लाक के च्यूरीगाढ़ गांव में आन सिंह बोरा के घर में 30 दिसंबर 1932 को हुआ था। लखनऊ विवि में कानून की शिक्षा ली। इस दौरान विवि के तत्कालीन कुलपति आचार्य नरेंद्र देव के संपर्क में आए। नरेंद्र देव उन्हें प्रताप भाई कह कर पुकारते थे। इसके बाद ही उन्हें प्रताप भय्या कहा जाने लगा।
सब से कम उम्र के विधायकः आचार्य नरेंद्र देव के संपर्क में आने से प्रताप भय्या समाजवादी विचार धारा से जुड़ गए थे। उन्होंने सोशलिस्ट पार्टी की टिकट से 1957 में विधायक का चुनाव लड़ा तथा 1962 तक उत्तर प्रदेश विधान सभा में सबसे कम उम्र के विधायक भी रहे। दूसरी बार विधायक बनने के दौरान वे इसके 1967-1968 में वह 10 माह के लिए उत्तर प्रदेश सरकार में स्वास्थ्य व सहकारिता मंत्री भी रहे।
राजनीति कम शिक्षा के प्रसार में दिया ध्यानः- शिक्षा के बाद सक्रिया राजनीति में आने के बावजूद प्रताप भय्या ने अपने जीवन का अधिकांश समय शिक्षा के प्रचार व प्रसार में समर्पित किया। अपने विधान सभा क्षेत्र खटीमा में थारू जनजाति को शिक्षा सुविधा देने के लिए उन्होंने सबसे पहले 1959 में खटीमा में थारु इंटर कालेज खटीमा की स्थापना की। प्रताप भैय्या ने 1962 के भारत-चीन युद्ध में शहीद जवानों के परिवारों की दशा देखकर ऐसे परिवारों के बच्चों के लिए स्कूल खोलने का मन बनाया। शहीद होने वाले जवानों के लिए तब आज की जैसा माहौल नहीं था। प्रताप भय्या ने शहीदों की पुण्य स्मृति में तथा उनके आश्रितों को नि:शुल्क शिक्षा मुहैया कराने का संकल्प लिया। इसके लिए नैनीताल मल्लीताल में 1 जुलाई 1964 को भारतीय शहीद सैनिक विद्यालय नैनीताल की स्थापना की। उनका यह प्रयास नैनीताल के मिशनरीज पब्लिक स्कूलों का विकल्प भी बन गया। कालेज के प्रधानाचार्य बिशन सिंह मेहता ने बताया कि उत्तराखंड में भारतीय शहीद सैनिक स्कूल एकमात्र है जो सरकारी शुल्क में अंग्रेजी माध्यम से बच्चों को शिक्षा दे रहा है। प्रताप भय्या अपने गुरू महान शिक्षाविद् आचार्य नरेंद्र देव के लिए पिता के समान आदर रखते थे। उनकी याद को चिरस्थायी करने के लिए भैय्या ने 1969 में उनकी स्मृति में 1969 आचार्य नरेंद्र देव शिक्षा निधि की स्थापना की। उसके बाद से उन्हीं की प्रेरणा लेकर शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में 120 से अधिक स्कूल स्थापित किए। उन्होंने वर्ष 1975 में अल्मोड़ा जिले के मानिला व स्याल्दे में उच्च शिक्षा केंद्र खोले जो बाद में डिग्री कालेज बन गए। यही नहीं स्वास्थ्य मंत्री रहते हुए उन्होंने वर्ष 1967 में नैनीताल मेें नर्सेज प्रशिक्षण केंद्र की भी स्थापना की यह केंद्र तब से लेकर आज तक निरंतर चल रहा है।
जाति प्रथा को समाप्त करने का प्रयासः प्रताप भय्या समाज में जाति प्रथा को विकास में बाधक मानते थे। समाज में सभी को बराबरी का दर्जा मिले इसके लिए उन्होंने अपनी जाति का नाम में उपयोग नहीं किया। यहां तक की उन्होंने शहीद सैनिक स्कूल में भी बच्चों के नाम के जाति नहीं लिखने की परंपरा शुरू की।

पोते के साथ आत्मीय पल

कई पुरस्कारः प्रताप भय्या को कई पुरस्कार व सम्मान मिले थे। इनमें उत्तर प्रदेश लोक रत्न, उत्तरांचल रत्न, लाइफ टाइम एचीवमेंट अवार्ड शामिल हैं।
समाजवादी विचारधारा को समर्पित रहा जीवनः प्रताप भैय्या सच्चे समाजवादी थे। जीवनभर खादी के वस्त्र पहनते रहे। भैय्या का पूर्व पीएम चौधरी चरण सिह, चंद्रशेखर व राष्ट्रपति रहे वीवी गिरी, जैल सिंह से पारिवारिक संबंध रहा। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर उनके नैनीताल स्थित आवास पर लंबे अर्से तक रहे। नेपाल के प्रधानमंत्री लोकेंद्र बहादुर से उनकी खासी निकटता रही। पूर्व राज्यपाल व सीएम एनडी तिवारी के साथ ही उन्होने सोशलिस्ट पार्टी से पहले चुनाव लड़ा। दोनों ही साथ ही उप्र विधान सभा में गए। तिवारी के साथ खुटानी से विनायक तक बने मार्ग में प्रताप भय्या ने भी श्रमदान किया था। प्रताप भय्या समय के बड़े पाबंद थे। उनके संयोजन में होने वाली गोष्ठियों में मुख्य अतिथि के समय पर नहीं आने पर कार्यक्रम शुरू कर दिया जाता था। प्रताप भय्या का मानना था कि समय के ऐसे पाबंद रहो कि लोग तुम्हारी आने जाने पर घड़ी मिलाएं। प्रताप भय्या घर से जिला कोर्ट पैदल ही आते जाते रहे। उनके बेटे ज्योति प्रकाश ने भी यही सिलसिला जारी रखा है।

(पत्रकार भूपेंद्र मोहन रौतेला, दैनिक आज से जुड़े हैं)

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