वैज्ञानिकों को​ मिली सुपरनोवा फिजल्ड गामा रे विस्फोट की खोज में सफलता, कैसे और क्यों मरते हैं तारे, इस बारे में वैज्ञानिकों को मिले और सुराग, एरीज के वैज्ञानिक डा. पांडे भी है शोध टीम में शामिल— नीरज कुमार जोशी, नैनीताल।


नैनीताल। नीरज कुमार जोशी


नासा के फर्मी स्पेस टेलीस्कोप को सुपरनोवा फिजल्ड गामा रे विस्फोट की खोज करने में सफलता मिली है। इसकी खोज से तारे कैसें और क्यों मरते हैं समेत इनसे निकलने वाले जेट कैसे बनता है और जेट निकलने की स्थि​ति से तारें की भविष्यवाणी समेत कईं अनसुलझे सिद्धांतों को समझने में आसानी मिलेगी। साथ ही इस पर चल रहे सिद्धांतों को और स्पष्ट करने में भी आसानी होगी।
26 अगस्त 2020 को हुई इस महत्वपूर्ण खोज को आज नेचर एस्ट्रोनॉमी विज्ञान पत्रिका में शोध पत्र प्रकाशित किया है। खोज टीम में शामिल नैनीताल स्थित एरीज के वरिष्ठ खगोल वैज्ञानिक डा. शशिभूषण पांडे ने इसकी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि दरअसल गामा-रे प्रस्फोट यानि जीआरबी घटना ब्रहमांड में सबसे शक्तिशाली व ऊर्जावान घटनाएं मानी जाती है जिनका पता अरबों प्रकाश वर्ष की दूरी से भी लगाया जा सकता है। दो सेंकेंड से कम या अधिक तक चलने वालें विस्फोटों की गणना के आधार पर घटना का विश्लेषण किया जाता है। जब सूर्य से कईं गुना विशाल तारे का ईंधन समाप्त हो जाता है तो कोर यानि केंद्रीय भाग अचानक पूरी तरह संकुचित हो जाता है और वह ब्लैक होल बन जाता है। जैसे ही पदार्थ ब्लैक होल की ओर घूमने लगता है उसमें कुछ दो शक्तिशाली जेंटों के रुप में करीब प्रकाश की गति से विपरीत दिशाओं में बाहर की ओर उत्सर्जित होते हैं। इनका पता खगोलविद तब लगा सकते हैं जब इनमें से एक जेट सीधे पृथ्वी की दिशा में हो। 26 अगस्त को दर्ज हुई इस खगोलीय घटना में वैज्ञानिकों ने पाया कि उच्च उर्जा विकिरण की इस घटना में ब्रहमांड की वर्तमान आयु के लगभग आधे समय से पृथ्वी की ओर आ रही थी। केवल एक सेंकेंड हुई इस घटना अब तकी खोजी गई अब तक का यह सबसे छोटा जीआरबी था। जो वैज्ञानिक जगत में नया कीर्तिमान माना जा रहा है।


क्या है जीआरबी
नैनीताल। गामा रे प्रस्फोट को जीआरबी का कहा जाता है। यह तब बनता है जब सघन वस्तुओं जैसे न्यूट्रान तारों जो तारकीय पतन के दौरान बन सकते हैं का एक जोड़ा अरबों वर्षों में अंदर की ओर सर्पिल होता है और टकराता है। वैज्ञानिक शोधों में यह भी सामने आया है कि कि पास की आकाशगंगाओं में, पृथक, शक्तिशाली चुबंकीय न्यूट्रान तारों से निकलने वाले फलेयर्स भी छोटे जीआरबी के जैसे दिखते हैं। लेकिन यह वास्तविक नहीं होते।

मंगल ग्रह की परिक्रमा कर रहे उपग्रह व ईएसए के इंटीगल उपग्रह में भी कैद हुई घटना
नैनीताल। करीब 0.65 सेकेंड तक चली जीआरबी की इस खगोलीय घटना को मंगल ग्रह की परिक्रमा कर रहे उपग्रह मार्स ओडिसी व यूरोपियन स्पेश एजेंसी के उपग्रह इंटीग्रल ने कैद किया है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह लगभग एक असफल विस्फोट था जो बिल्कुल न होने के करीब था। फिर भी इस विस्फोट ने हमारी आकाशगंगा से एक समय में उत्सर्जित ऊर्जा से 1.4 करोड़ गुना ऊर्जा उत्सर्जित की।

मरणास्न तारे छोटे विस्फोट भी कर सकते हैं: बिन—बिन झांग
नैनीताल। चीन के नानजिंग विवि व नेवादा विवि के वैज्ञानिक बिन—बिन झांग ने पत्रिका को दिए बयान में कहा कि हम यह पहले से जानते थे कि विशाल तारों से जुड़े कुछ जीआरबी छोटे जीआरबी के रुप में दर्ज हो सकते हैं लेकिन हमें ऐसा लगा कि यह सीमित यांत्रिकी क्षमताओं के कारण है। यह विस्फोट बेहद विशेष है क्योंकि यह निश्चित रुप से छोटी अवधि का जीआरबी है। साथ ही इसके अन्य गुण एक तारे के पतन से इसकी उत्त्पत्ति की ओर भी इशारा करते हैं। जिससे हम स्पष्ट रुप से यह कहा जा सकता है कि मरणासन्न तारे छोटे विस्फोट भी कर सकते हैं।

गामा किरणों के विस्फोट को गहराई से समझने में मदद मिलेगी: डा. पांडे
नैनीताल। आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान एवं शोध संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. शशिभूषण पांडे ने कहा कि इस उपलब्धि से गामा किरणों के विस्फोट को गहराई से समझने में मदद मिलेगी। उल्लेखनीय है कि डा. पांडे ने 10.4 मीटर जीटीसी से इस घटना को देखा और उसके दूरी का मापन कर इस कार्य में महत्वूपर्ण भूमिका निभाई है।

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