शक्ति स्वरूपा मां नंदा की महिमा का लोक मान्यता के साथ ही शास्त्रों में है गुणगान, आचार्य घनानंद कांडपाल( पूर्व प्रधानाचार्य)


 नैनीताल। लाइव उत्तरांचल न्यूज

Acharya Pt. Ghananand Kandpal (Former Principal)

भाद्र माह के नन्दाष्टमी का व्रत एवं पुण्य पर्व की पावन बेला  26 अगस्त 11 गते बुधवार को है। मां नन्दा शक्ति स्वरुपा का नमन करते हुए शास्त्रों में उपलब्ध उनकी महिमा पर प्रकाश डालने की कोशिश कर रहे हैंः-

आदि शक्ति हैं मां नंदाः- भगवती आदिशक्ति का नन्दाष्टमी के नाम से  पूजन होता है तथा मेलों का आयोजन किया जाता है। सैकड़ों लोग मां नन्दा के पूजन में शामिल होते हैं। मां के निमित्त मेला वर्ष में दो बार आयोजित किया जाता है। वर्षारम्भ में चैत्र अष्टमी उत्तरायण में तथा भाद्रमास अष्टमी दक्षणायन में मेला संपन्न होता है। शास्त्र में आऩे वाले आख्यान के अनुसार प्राचीन समय में शुम्भ और निशुम्भ महावली दैत्य उत्पन्न हुए तपस्या के बल पर अपार शक्ति प्राप्त करते हुए पूरी दुनियां में हाहाकार मचा दिया। देवता अत्यधिक दु:खी हुये। ऐसे समय मे समस्त देवों ने भुवनेश्वरी देवी का ध्यान किया। तथा समस्त दु:खों से मुक्ति पाने की लालसा से दोनों दैत्यों के विनाश की प्रार्थना की। 

ऊं वालरविद्युति मिन्टु किरीटातुंग कचांनयनत्रययुक्तामस्मेरमुखी वरदाडकुंश पाशामीतिराप्रभजे भुवनेद्भरीम्

शुम्भ आदि दैत्यो को मारकर देवता प्रसन्न हुए अनेक नामों से स्तुति करने लगे। उस समय आदि शक्ति सिंह वाहिनी जगदम्बा भगवती ने कहा: हे देवताओ अब आगे क्या चाहते हो, वरदान मांगों। देवताओं ने प्रार्थना की, हे देवी तुम सदैव धर्म की रक्षा करते हुये शत्रुओं का नाश करती रहो देवी भगवती ने कहा—नन्द गोप गृहे जाता यशोदा गर्भ सम्भवा: तत्सतौनाशयिप्यामि, विन्ध्यांचलनिवासिनी उस  मन्वन्तर में वैप्रचितय नाम के दैत्यों का वध किया। अत: अष्टभुजा धारी योगमाया देवताओं की रक्षा करने वाली भगवान विष्णु के साथ धर्म की रक्षा के लिए अवतार धारण करती है।  योगमाया नन्दा, रक्तदन्तिका, शताक्षी, शाकम्भरी, भीमा देवी तथा भ्रमर का रुप धारण करते हुए भ्रामरी छह नामों से विख्यात हुई। अत: जहां पर इन नामों से देवी स्थापना हुई। उन स्थानों में यह नन्दाष्टमी का मेला एवं देवी का पूजन होता है। इत्थं यदा यदा वाधा दानवोत्थाभविष्यतितदा तदा वतीर्या हं करिष्यमि अरिसंक्षयमृ् यह दिन राधाष्टमी के नाम से भी प्रसिद्ध है। हरिषेण गोप की कन्या राधा का विवाह कृष्ण के साथ हुआ। अत: रासलीला का इस मेले में बहुत महत्व है। इससे पूर्व दिन अमुक्ताभरण सप्तमी पर्व है। अत: सप्तमी के दिन महिलाएं अपने अटल सौभाग्य के लिए डोर या दूरवड़ धारण करती है।  भुवनेश्वरी देवी आदि शक्ति के अनेक रुप हैं। महाकाली को उत्पन्न कर शत्रुओं एवं दुष्टों का दमन कर लेने के बाद महाकाली को सुन्दर स्वरुप प्रदान कर हिमांचल में निवास प्रदान किया। स्वंय भगवान शिव, ब्रहमा, विष्णु की स्तुति सुनकर अंर्तध्यान हो गईं। 
मां का ध्यान करेंः अष्टमी की तिथि को भगवती दुर्गा का ध्यान करना चाहिए तथा नवार्ण मंत्र ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे नम: इस मंत्र का जप करना चाहिए। जिसे प्राणियों के दु:खों का नाश एवं सुख की प्राप्ति होती है। दुर्गा सप्तशती का पाठ अवश्य सुनना चाहिए। यह भगवती नन्दा समस्त देवताओं एवं प्राणियों की माता है। इनके अंश से अन्य देवियां प्रादुर्भूत हैं। या देवी सर्वभूतेषु मातृ-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
सर्वोच्च शिखर पर है निवासः-

आदि शक्ति का निवास स्थान हिमालय की सर्वोच्च चोटी नंदा है। अत: माता शक्ति के अनेक रुप हैं। आदि शक्ति के अंश मात्र हैं। पूर्ण अंश भुवनेश्वरी नन्दा सिंह वाहिनी आदि शक्ति हैं। विशेष कर द्वापर युग एवं कलियुग में धर्म रक्षा एवं प्राणियों के दु:ख दूर करने हेतु अपने छह अवतारों का बखान प्राणीमात्र के लिए सुखदायक है। नन्द राजा के वंशज नन्दा को अपने कुल देवी तथा बहन स्वरुप समझते हैं। सदैव आदि शक्ति नन्दा की अराधना करते हैं। प्रति बारह वर्ष पूर्ण होने पर नन्दा राजजात यात्रा संपन्न् की जाती है। जिसमें राज्य सरकार सहयोग करती है। इस यात्रा को सफल बनाने मे सहयोगी लोग सदैव पारलौकिक सुखों की अनुभूति करते हैं। समस्त बीमारियों की नाशक मां नन्दा हैं। रोगान शेषान पहंसि तुष्टा रुष्टा,तु कामान् सकलानभीष्टान। व्वांमाश्रितानां न विपन्नराणां,त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति।।’ इस मत्र का जप करना वर्तमान समय की महामारी एवं दु:खों से मुक्ति प्राप्ति का साधन भी है। ऋषि—मुनियों की तपस्या से प्राप्त मंत्र शक्ति इस लोक तथा परलोक हेतु सुखदायिनी है। आत्मा द्वारा शरीर छोड़े जाने पर उत्तर द्वार अर्थात अकण्टक मार्ग प्राप्त होता है। यह मार्ग नन्दा शक्ति —भक्तों को प्राप्त होता है। नवीन वस्त्र एवं ध्वजा शक्ति को प्रिय हैं। 

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे नम:

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