सामवेदी उपाकर्म हरताली का विशेष महत्व, गौरी—शंकर की पूजा का विधान आचार्य पं. घनानंद शास्त्री( पूर्व प्रधानाचार्य)


नैनीताल। लाइव उत्तरांचल न्यूज

Acharya Pt. Ghananand Kandpal (Former Principal)


भाद्रमास में सामवेदी उपाकर्म हरताली का विशेष महत्व है। इस दिन सामवेदी नई जनेऊ धारण करते हैं जबकि  गौरी-शंकर की पूजा का विधान भी है। इस बार सामवेदी: त्रिपाठी, तेवाड़ी , तिवारी पंडितों का यज्ञोपवीत (जनेऊ) 22 अगस्त 7 गते भाद्रमास शनिवार को है। यह पर्व रक्षाबंधन से 18 वें दिन संपन्न होता है। सनातम धर्म में युर्जवेदीय शाखा से सामवेदी दो शाखाएं हैं।  चारों वेद ऋगवेद, यर्जुवेद, सामवेद, अथर्ववेद भिन्न—भिन्न हैं। मुख्यत: सामवेद शाखा में गौतम गोत्र के लोग तथा अल्पत: अन्य गोत्र के लोग हैं। सामवेद की लोकप्रियता के कारण कर्मकाण्ड विधियां पृथक—पृथक हैं। चूंकि अलग—अलग समय लिखे जाने से देशकाल परिस्थितियों के अंतर से कुछ भिन्नता दिखाई देती है। यज्ञोपवीत धारण करने एवं पूजा प्रतिष्ठा का सिद्धांत श्रावणी उपकर्म के समान है। आने हाथ से अथवा देवज्ञ पुरोहित के हाथ से 96 गिनती कर जनेऊ तैयार करने का विधान है। जिसमें 9 तंतुओं का संयोग होता है। मनुष्य के तत्व में 96 तत्व विद्यमान हैं। अत: शारीरिक समस्त तत्वों के उजागर के लिए इस लंबाई को प्रमाणिक माना गया है। विधिवत प्रतिष्ठित जनेऊ को धारण करना ही उत्तम है। जनेऊ को विधिवत इस प्रकार की गिनती को ध्यान में रखकर बनाने से गायत्री सिद्ध होती हैं। जिसे मनुष्य का जीवन सार्थक होता है। कई लोग जनेऊ न होने से उतार देते हैं, जो गलत है। संध्या पूजन चाहे जितना भी हो या न हो तो भी यज्ञोपवीत हमेशा धारण करना चाहिए। इससे मनुष्य जीवन सदैव सुखी एवं आरोग्य रहता है ।


यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं
प्रजपतेर्यत्सहजापरुरस्ताद
आयुष्य मंग्र प्रतिमचच शुभं
यज्ञोपवीत वलमस्त तेज

अधिकांश लोग हरतालिका के दिन सामगान उपाकर्म समझते हैं। वस्तुत: संयोगवस कभी दोनों तिथियां एक साथ हो जाती है। किंतु सामवेदी लोग हस्त—नक्षत्र में जनेऊ धारण करते हैं। हरताली व्रत विशेषत:भगवान शंकर एवं मातागौरी (गौरी—शंकर) पूजा से संबंधित है। महिलाएं एवं कुंवारी लड़कियां इस व्रत को यथास्थित सौभाग्य  प्राप्ति तथा योग्य पति प्राप्ति के लिए करती हैं। इस समय हरतालिका व्रत 21 तारीख को है। हस्त—नक्षत्र उस दिन न होने से यज्ञोपवीत धारण 22 तारीख को है। सिंह राशि में सूर्य होने पर एवं हस्त नक्षत्र में जनेऊ धारण करना श्रेष्ठ है।  इसे सामवेदी उपाकर्म के नाम से भी जाना जाता है। हरताली तृतीया भगवान श्रीकृष्ण के नामकर्म का दिवस भी माना गया है। चूंकि जन्म से 11वें दिन नामकरण की प्रथम तिथि होती है। संयोग से हस्त— नक्षत्र तृतीया हरतालिका एक साथ होने पर सामवेदी उपाकर्म इस दिन संपन्न होता है। जिसे हरताली तृतीया कहते हैं।


श्रावणी उपाकर्म एवं सामागान उपाकर्म: दोनों पर्वों  इतना अंतर क्यों हुआ। जब कि  यज्ञोपवीत धारण करने का विधान करने विधान एक ही है। वास्तविकता यह है अधिकांश ब्राहम्ण वर्ग दक्षिण तथा अन्य स्थानों से उत्तराखंड में शान्ति एवं भक्ति  के लिए आये। सभी लोगों द्वारा सोलह संस्कारों के आधार पर उपनयन संस्कार को विशेष महत्व दिया गया है। तथा सभी विद्याओं  एवं कला कौशल के ज्ञान हेतु यज्ञोपवीत  को श्रेष्ठ  माना। यज्ञोपवीत के द्वारा आत्मा एवं परमात्मा का ज्ञान सिद्ध गायत्री मंत्र से ही प्राप्त होता है।

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हस्त नक्षत्र—किसी भी असभंव कार्य को पूर्ण करने की इच्छा से कार्य हस्त नक्षत्र  में प्रारंभ किया जाता है। इसलिए हस्त नक्षत्र में यज्ञोपवीत पहनकर मनुष्य कर्म—कुशलता से समस्त सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है। गौतमी गोत्र ब्राहम्ण तेवाड़ी— त्रिपाठी लोग गुजरात के अहमदाबाद से राजा उधानचंद के समय अल्मोड़ा आये। ये लोग तंत्र विद्या में निपुण थे। ये कहा जाय की महान त़ांत्रिक थे। अल्मोड़ा में जल की कमी होने पर पोक्षण विधि से कईं स्थानोें पर जल उत्पन्न किया। वास्तव में ये श्रेष्ठ बाहम्ण कहलाये गये। अग्नि होत्री भी इनका पद है। पूर्व समय में हस्त— नक्षत्र में ही सभी लोगों से श्रावण मास की पूर्णिमा को रक्षाबंधन उपाकर्म संपन्न कराया। किंतु अगले वर्ष हस्त—नक्षत्र  नह होने से इस साखा के लोगों ने नक्षत्र की महानता  को देखकर शुक्ल पक्ष हस्त—नक्षत्र में सामवेदी उपाकर्म संपन्न किया। अत: सामवेदी ब्राहम्ण सदैव हस्त नक्षत्र में जनेऊ धारण करते हैं।
यह पावन पर्व  अधिकांशत:  वराह जंयती हरताली तृतीया को होता है। कभी—कभी अधिक मास आदि की स्थिति में नक्षत्र की सीमा में वृद्धि या हास होने से दूसरे दिन होता है। अत: सामवेदी उपाकर्म के संबंध में भ्रामकता कहीं पर नहीं है। हस्त नक्षत्र में यह उपाकर्म श्रेष्ठ है।

ऊं सामदेवाय नम

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