वर्तमान युग में बदलता भिटौली का स्वरुप, कुमाऊं में भिटौली परपंरा से जुड़ी कथा व महत्वपूर्ण जानकारियों के साथ प्रकाश जोशी का आलेख

नैनीताल। लाइव उत्तरांचल न्यूज

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भिटौली का अर्थ है भैंट करना उत्तराखण्ड के कुमाऊं में प्रतिवर्ष चैत्र महिने में परिजन विशेषतर पिता या भाई अपनी बहन या बेटी के लिए भिटौली लेकर उसके ससुराल जाता है। भिटौली फूल देई संक्रांति के दिन से चैत्र का महिना शुरू होता है। इसे आम बोलचाल की भाषा में भिटौली महीना या काला महीना भी कहा जाता है। वर्तमान में भिटौली का स्वरुप बदल रहा है। हालांकि पहाड़ी अंचलों में आज भी महिलाओं को भिटौली देने की पंरपरा कायम है। भिटौली से जुड़ी इस जानकारी को हमारे सुधी पाठक प्रकाश जोशी ने साझा किया है।

भिटौली को लेकर कुमाऊंनी लोक कथा प्रचलित है जिसे आज भी बुजुर्गों से इस माह में कहते सुना जा सकता है जो इस प्रकार है—
भिटौली की कथा भाई बहन के अथाह प्यार से जुड़ी है। कहा जाता है कि दे बुली नाम की एक बहिन नरिया नाम के अपने भाई से बहुत प्यार करती थी। दूसरे गांव में शादी होने के बाद चैत्र का महीना लगते ही अपने भाई का इन्तजार करने लगी। इंतजार इतना बड़ा कि उसने अन्न— जल त्याग दिया। एक दिन जब देबुली सो रही थी उसका भाई नरिया अपने साथ विभिन्न प्रकार के खानपान, फल, खजूरे आदि लेकर भेंट करने आया। बहन को सोता देख वह प्रमाण कर वापस लौट आया। जब बहन की नींद खुली तो अपने पास भेंट का सामान देखकर वह समझ गई उसे एहसास हुआ कि उसका भाई उससे मिलने आया लेकिन वह सोती रह गई। इसका उसे बेहद दु:ख हुआ। वह हमेशा एक ही शब्द कहती रहती ” भै भूखो मैं सीति” । इसी दुख में उसके प्राण चले गये। अगले जन्म में वह न्योली नाम की चिड़िया के रूप में पैदा हुई और कहा जाता है कि वह इस माह में आज भी दुखी रहती है। आज भी उस चिड़िया के स्वर में ” भै भूखो में सीति” की ध्वनि प्रतीत होती है।

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