सामान्य से दिखने वाला तिमला फल है औषधीय गुणों से भरपूर, आइये जानें वैज्ञानिक महत्व समेत फल और पेड़ से जुड़ा इतिहास

नैनीताल। लाइव उत्तरांचल न्यूज

उत्तरांखण्ड व पर्वतीय राज्यों के लोग तिमला के फल से परिचित होंगे।। आज हम आपको औषधीय गुणों से भरपूर इस फल के बारे में बताने जा रहे हैं। हमारे सुधी पाठक भरत गिरी गोसाईं ने हमें जानकारी युक्त आलेख भेजा है। हम इसे आप तक पहुंचाने का प्रयास कर रहें हैं। उम्मीद है कि आपको यह लेख पसंद आएगा।

उत्तराखंड में कई प्रकार के प्राकृतिक बहुमूल्य औषधीय फल वनस्पतियां पाये जाते हैं। जो न केवल स्वादिष्ट होते है बल्कि हमारी सेहत के लिए भी बहुत फायदेमंद साबित होते हैं। इन्ही में से एक जंगली फल है— तिमला। तिमला को हिंदी मे अंजीर तथा अंग्रेजी मे एलीफेंट फिग के नाम से भी जाना जाता है। उत्तराखण्ड में इसे लोग तिमुला, तिमिली, तिमल आदि नामो से जानते है।
तिमला मोरेसी कुल का पौधा है। इसका वानस्पतिक नाम फाइकस आरीकुलेटा है। विश्व मे फाइकस जीनस के अंतर्गत लगभग 800 प्रजातियां जोकि समुद्र तल से 800 से 2000 मीटर की ऊंचाई तक पाये जाते है। मुख्यत: तिमला एक जंगली पौधा है, जिसकी ऊंचाई सामान्यतः 5 से 10 मीटर तक होती है। तिमला भारत के अलावा चीन, पाकिस्तान, नेपाल, म्या॑मार, भूटान, दक्षिण अमेरिका, ब्राजील, टर्की, ईरान तथा वियतनाम आदि देशो मे बहुयातन पाया जाता है। स्थानीय लोग तिमला की खेती नही करते है। यह खेतो की मेढ़ो अथवा बंजर भूमि पर स्वत: ही उग जाते हैं।

तिमला का फल वास्तविक फल नही है: वैज्ञानिको के अनुसार तिमला का फल वास्तविक फल ना होकर एक उल्टा (इनवर्टेड) फूल है जिसमे ब्लॉज्म दिख नही पाते है। तिमला का फल पक जाने पर हल्के लाल रंग अथवा पीले रंग मे परिवर्तित हो जाता है, जो कि स्वादिष्ट एवं पौष्टिक होते है। पक्षियां, चरवाहे, स्थानीय लोग और पर्यटक इस जंगली फल को बड़े चाव से खाते है।

तिमला मे मौजूद है विभिन्न पोष्टिक तत्व: पके हुए तिमला का फल ग्लूकोस, फ्रुक्टोज, सुक्रोज एवं पोटेशियम का बेहतरीन स्रोत माना जाता है। वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार प्रति 100 ग्राम स्वस्थ एवं पके हुए तिमला के फल मे लगभग 50% ग्लूकोस, 27% प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट, 17% फाइबर, 6% प्रोटीन, 2.11 मिलीग्राम पोटैशियम, 1.35 मिलीग्राम कैल्शियम, 0.90 मिलीग्राम मैग्नीशियम तथा 0.28 मिलीग्राम फास्फेट पाया जाता है। इसके अलावा तिमला के फल मे प्रचुर मात्रा मे एंटीऑक्सीडेंट भी पाया जाता है। जिसका प्रयोग फार्मास्यूटिकल कंपनियों मे औषधि निर्माण मे किया जाता है। शोध पत्र ‘इंटरनेशनल जनरल ऑफ़ फार्मास्यूटिकल साइंसेस रिव्यू एंड रिसर्च’ के अनुसार तिमला का फल पौष्टिकता के आधार पर सेब तथा आम से भी श्रेष्ठ है।

तिमला के फायदे: तिमला के अनेक फायदे है जैसे 1.चारा के रूप मे: तिमला की पत्तियो को चारा के रूप मे प्रयोग किया जाता है। कहा जाता है कि तिमला के पत्तियो को दुधारू पशुओ को देने से दूध की मात्रा बढ़ाया जा सकता है। 2. सब्जी के रूप मे प्रयोग: स्थानीय लोग तिमला के कच्चे व कोमल फलो को सब्जी के रूप मे प्रयोग करते है। तिमला के फलो मे मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स शरीर मे टॉक्सिक फ्री रेडिएशन को निष्क्रिय करने मे सहायक है। 3. रायता बनाने मे: तिमला के फलो का प्रयोग रायता बनाने मे किया जाता है, जो कि स्वास्थ्य के लिए बहुत अच्छा माना जाता है। 4. शारीरिक विकारो के निवारण मे प्रयोग: तिमला का फल कई सारी बीमारियां जैसे अतिसार, हैजा, पीलिया, घाव भरना, पेट की कब्ज आदि के रोकथाम और निवारण मे प्रयोग किया जाते है। 5. औषधियो के निर्माण मे प्रयोग: तिमला मे मौजूद रासायनिक गुणो के कारण इसके फलो का प्रयोग फार्मास्यूटिकल कंपनियों मे औषधियों के निर्माण मे किया जाता है। वन अनुसंधान संस्थान (एफआरआई) देहरादून के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. वाई सी त्रिपाठी ने अपने शोध मे बताया कि तिमला के फल मे लगभग 1.76% तेल पाया जाता है। तिमला के तेल मे चार फैटी एसिड्स (वोसीसिनिक एसिड, अल्फा लाइनोलेनिक एसिड, लाइनोलेनिक एसिड तथा ऑलिक एसिड) पाये जाते है, जो कि कैंसर तथा दिल के विभिन्न बीमारियो के इलाज मे कारगर है। नियमित संतुलित मात्रा मे तिमला के फल का सेवन करने से कोलेस्ट्रोल का स्तर को नियंत्रित किया जा सकता है। इसके अलावा तिमला का फल जेम, जेली तथा अचार आदि बनाने मे भी किया जाता है। पारिस्थितिक संतुलन मे तिमला का पौधा महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। प्राचीन समय मे तिमला के पत्तियो का प्रयोग खाना खाने की प्लेट (पत्तल) के रूप मे किया जाता था। किंतु वर्तमान मे प्लास्टिक के प्लेटो का अत्यधिक प्रयोग हो रहा है, जिस कारण प्रतिवर्ष पर्यावरण प्रदूषण मे वृद्धि हो रही है। तिमला के पत्तियो का प्रयोग धार्मिक कार्यों मे भी किया जाता है, जिस कारण इसे पीपल के पेड़ की तरह पवित्र माना जाता है। सरकार यदि इस प्रकार के पौष्टिक एवं औषधिय गुणोयुक्त जंगली फलो के लिए कोई ठोस नीति जैसे मूल्यवर्धन, मार्केटिंग, नेटवर्किंग बनाये तो यह किसानो तथा नौजवानो के लिए स्वरोजगार व आर्थिकी हेतु एक बेहतरीन विकल्प बन सकता है।

भरत गिरी गोसाईं

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