एशिया महाद्वीप के 1.3 बिलियन लोगों के लिए जीवन और जीविका का आधार है हिमालय, राष्ट्रीय वेबीनार में हिमालयी क्षेत्रों की जनसंख्या प्रति दशक कम होने पर जताई चिंता

नैनीताल। लाइव उत्तरांचल न्यूज

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हिमालय का समूचे एशिया महाद्वीप में अपना विशेष महत्व है। यह एशिया का सबसे बड़ा वाटर टावर होने के साथ ही विश्व का तीसरा सबसे बड़ा हिम भण्डार धु्व्रीय प्रदेशों को छोड़कर) है। साथ ही यह एशिया की 1.3 बिलियन लोगों के लिए जीवन और जीविका का संपोषक भी है। लिहाजा इसका महत्व व सरंक्षण का विषय अपने आप में महत्वपूर्ण हो जाता है।
यह बात वक्ताओं ने कुमाऊं विवि व हेमवंती नंदन बहुगुणा विवि के संयुक्त तत्वावधान में स्पर्श गंगा अभियान के तहत “हिमालय: जीवन और जीविका का संपोषक” विषय पर राष्ट्रीय कार्यशाला में वक्ताओं ने कही। इस दौरान केंद्रीय शिक्षा मंत्री तथा स्पर्श गंगा अभियान के संरक्षक डा. रमेश पोखरियाल निशंक ने अपना महत्वपूर्ण संदेश भी कार्यशााला में शिक्षा सलाहकार डा. राजेश नैथानी के माध्यम से पहुंचाया। सन्देश में पर्यावरण संरक्षण को वैश्विक चुनोती बताते हुए कहा कि हिमालय जोकि मानव सभ्यता के इतिहास का सबसे बड़ा गवाह है उसकी चिंता के बगैर विश्व में पर्यावरण और पारिस्थितिकी की बात करना बेमानी होगा। हम सभी को संकल्पित होकर इसके संरक्षण के प्रयास करने होंगे। कुविवि​ कुलपति प्रो. एनके जोशी ने कहा कि हिमालय दुनिया की सबसे नवीन एवं सृजनशील पर्वतमाला है उसमे लगातार हो रही भूगर्भीक हलचलों के कारण यह प्राकृतिक आपदाओं का केंद्र बना हुआ है। जिसके चलते पलायन आदि समस्याएं आम हो गई हैं। हिमालयी क्षेत्रों के संरक्षण के लिए समग्र रूप नीतियां व उन्हें क्रियान्वित करने की आवश्यकता है। मुख्य अतिथि एचएनबी विवि के वीसी प्रो. अन्नपूर्ण नौटियाल ने कहा कि हिमालय के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए स्पर्श गंगा मुहिम के तहत शुद्ध पेयजल व आजीविका आदि महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। मुख्य वक्ता इतिहासकार एवं पर्यावरणविद प्रो. अजय रावत ने कहा कि सरकार की अदूरदर्शिता एवं तुष्टीकरण नीतियों के चलते हिमालयी क्षेत्र से लोग पलायन का मजबूर हैं। पहांड़ों में बढ़ते कंक्रीट के जंगल चिंता का विषय हैं। हमें इसके विरुद्ध एकजुट होकर निरन्तर आवाज़ उठानी होगी । मोहनलाल सुखाडिया विश्वविद्यालय उदयपुर के प्रो. पीआर व्यास ने कहा कि हिमालयी राज्यों में जनांकिकीय असंतुलन की स्थिति पैदा हो रही है जिसे रोकने के लिए पर्वतीय गाँवों को शिक्षा स्वास्थय एवं अवस्थापना सुविधाओं से जोड़ना होगा। हिमालयीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. जेपी पचौरी ने कहा कि देश के लोगों को गंगा यमुना संस्कृति की संवाहक नदियां के उदृगम स्थल हिमालय के संरक्षण के प्रयास करने होंगे। मिजोरम विश्वविद्यालय आयजोल के प्रो. वीपी सती ने हिमालयी क्षेत्रों में जलवायु एवं सामजिक संरचना में हो रहे परिवर्तन के साथ पलायन की समस्या को जोडते हुए कहा कि आज पूरे हिमालय क्षेत्र की दशकीय जनसँख्या वृद्धि दर ऋणात्मक हो गयी है जो कि हिमालय में आने वाले समय में जीवन और जीविका की सततता के लिए गंभीर चुनौती होगी । स्पर्श गंगा अभियान के राष्ट्रीय समन्वयक प्रो. अतुल जोशी ने बताया कि हिमालय वैश्विक स्तर पर पर्यावरण के समुचित संरक्षण एवं संवर्धन का न केवल महत्त्वपूर्ण कारक है बल्कि मानव सभ्यता के पौराणिक, एतिहासिक, आध्यात्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, पर्यावरणीय एवं आर्थिक सभ्यता एवं विकास का जीता जागता गवाह भी है। हमारे लिए यह विषय इसलिए और भी अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि न केवल हम इस हिमालय में जन्मे, पले बडे हैं। प्रो. जोशी ने इस कोविड काल में भी स्पर्श गंगा अभियान के तहत किये गए राहत कार्यों की भी जानकारी दी। कहा कि यह अ​भियान आगे भी जारी रहेगा। इसके तहत राज्य में प्रत्येक जनपद के जिला चिकित्सालय में एयर प्यूरीफायर लगाने की व्यवस्था का कार्यक्रम प्रस्तावित है। कार्यक्रम की अध्यक्षता स्पर्श गंगा अभियान की राष्ट्रीय संयोजक आरुशी निशंक ने की। प्रो. प्रभाकर बडोनी ने सभी अतिथियों का आभार जताया। वेबीनार में प्रो. सविता मोहन, प्रो.सुषमा मिश्र, प्रो. केसी पुरोहित, प्रो.जीसीजोशी, डॉ. सर्वेश उनियाल, प्रो. बी.आर पंत, प्रो. एलएस बिष्ट, प्रो.सीएस जोशी, रीता चमोली आदि मौजूद रहे।

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