लाइव उत्तरांचल न्यूज विशेष: जानियें 33 लाख वर्ग किमी के विशाल क्षेत्रफल और 150 करोड़ की आबादी वाले हमारे देश में क्या हैं निर्वाचन प्रणाली, विधायक से लेकर राष्ट्रपति के निर्वाचन में अहम है आयोग की भूमिका। आलेख— नीरज कुमार जोशी, नैनीताल।

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नैनीताल। लाइव उत्तरांचल न्यूज/नीरज कुमार जोशी


निर्वाचन आयोग ने देश के पांच राज्यों में चुनाव तिथियों की घोषणा कर दी है। उत्तराखण्ड, यूपी, पंजाब, गोवा व ​मणिपुर में चुनावी कार्यक्रम तय हो गया है। पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में लाखों युवा पहली बार अपने अधिकार का प्रयोग करेंगे। हमारा मानना है कि प्रत्येक व्यक्ति को यह जानना आवश्यक है कि जिस देश का वह वासी है उसकी शासन व्यवस्था क्या है और उन संस्थाओं का क्या स्वरुप है जो उनके जीवन को शासित करती है और उनके स्वतंत्रताओं की रक्षा करती है। इन्हीं संस्थाओं में प्रमुख है भारत का निर्वाचन आयोग। निर्वाचन आयोग ने पांच राज्यों में चुनावी कार्यक्रम की घोषणा कर दी है ऐसे में हमारे देश में निष्पक्ष व निर्बाध रुप से चुनाव प्रक्रिया संपन्न करने की क्या व्यवस्था है इस जानकारी को आप तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं। लाइव उत्तरांचल न्यूज लोकतंत्र के इस पर्व के प्रति जागरुकता बढ़ाने के उदृदेश्य से आप तक यह जानकारी पहुंचाने का प्रयास कर रहा है आप सभी सुधी पाठकों के सुझाव सादर आमंत्रित हैं-

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भारत में निर्वाचन प्रणाली, संविधान में सार्वभौमिक व्यस्क मताधिकार को लेकर क्या है व्यवस्था
नैनीताल।
भारत जैसे विशाल आकार वाले देश लगभग 33 लाख वर्ग किमी, भारी जनसंख्या वाले लगभग 150 करोड़ की आबादी और इतने अधिक मतदाताओं वाले देश में निर्वाचन कराना एक बहुत बड़ा काम है। भारतीय चुनाव आयोग की स्थापना 25 जनवरी 1950 को की गयी थी। यह संसद के दोनो सदनों के लिए और राज्यों के विधान सभाओं के लिए निर्वाचन के अतिरिक्त राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के उच्च पदों के लिए भी निर्वाचन करता है। प्रतिनिधि संसदीय लोकतंत्र में सफल निर्वाचन प्रक्रिया की बेहद महत्वपूर्ण भूमिका होती है। हमारे संविधान में सार्वभौमिक व्यस्क मताधिकार के लिए उपबंध किया गया है। ऐसे प्रत्येक नागरिक को मताधिकार करने का अधिकार दिया गया है जिसने 18 वर्ष या इससे अधिक की आयु प्राप्त कर ली हो, चाहे उसका धर्म, लिंग या जन्म स्थान कोई भी हो। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि निर्वाचन निर्बाध और निष्पक्ष हों और ऐसे प्रतीत भी हों। इसलिए चुनाव एक स्वतंत्र प्राधिकरण के निर्देशन में कराये जाते हैं और यह प्राधिकरण निर्वाचन आयोग कहलाता है।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त और सदस्यों की नियुक्ति की क्या है प्रक्रिया
नैनीताल।
दरअसल निर्वाचन आयोग के मुख्य निर्वाचन आयुक्त और ऐसे अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। देश में अक्तूबर 1993 में एक अध्यादेश के द्वारा दो निर्वाचन आयुक्त किये गये थे, जिन्हें वही स्थिति तथा हैसियत प्रदान की गई थी जो मुख्य निर्वाचन आयुक्त को प्राप्त थी। इसके अतिरिक्त आयोग से अपेक्षा की गई थी कि वह एक निकाय के रुप में कार्य करे तथा जो भी निर्णय ले सर्वसहमति से ले या यदि ऐसा न हो पाए तो बहुमत के आधार पर निर्णय ले। इस अध्यादेश के बाद जिसका स्थान अधिनियम ने ले लिया था उसे मुख्य निर्वाचन आयुक्त द्वारा चुनौती दी गई थी। मुख्य निर्वाचन आयुक्त के कर्तव्यों के महत्व को देखते हुए ऐसे विशिष्ट व्यक्ति को इस पद नियुक्ति किया जाता हे जिसे प्रर्याप्त प्रशासनिक अनुभव हो, विधि का ज्ञान हो और जिसे समाज में भी उच्च स्थान प्राप्त हो। आयोग के सदस्यों की सेवा की शर्तों में और पदावधि में उनकी नियुक्ति के पश्चात उनके लिए अलाभकारी ​परिवर्तन नहीं किए जा सकते है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसके पद से उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की तरह प्रक्रिया द्वारा ही हटाया जा सकता है, अन्यथा नहीं। अन्य निर्वाचन आयुक्त को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश के बिना उसके पद से नहीं हटाया जा सकता।
निर्वाचन आयोग के दायित्व और अधिकार
नैनीताल।
निर्वाचन प्रक्रिया को निर्बाध व स्वतंत्र रुप से संपन्न कराने के लिए केंद्र तथा राज्य सरकारों को आयोग को उतने अधिकारी और कर्मचारी उपलब्ध कराने होते हैं जितने चुनाव संपन्न कराने के लिए आवश्यक हों। ये सभी नामित अधिकारी—कर्मचारी निर्वाचन सभी कृत्यों के लिए निर्वाचन आयोग के प्रति उत्तरदायी होते हैं।

राज्यों व जिलों में निर्वाचन आयोग की संरचना
नैनीताल।
प्रत्येक राज्य के लिए एक मुख्य निर्वाचन अधिकारी होता है जिसे निर्वाचन आयोग द्वारा निर्वाचक— नामावलियां तैयार करने, उनका पुनरीक्षण करने और उनमें शुद्धियां करने के काम के अधीक्षण के लिए और राज्य में सभी निर्वाचनों का संचालन करने के लिए मनोनित किया जाता है। इसी प्रकार जिले के लिए एक जिला निर्वाचन अधिकारी होता है जो मुख्य निर्वाचन अधिकारी के निर्देशन के अधीन अपने जिले में निर्वाचनों से संबंधित सारे समन्वय तथा अधीक्षण कार्यों को संपन्न करते हैं। आमतौर पर जिलाधिकारियों या उपायुक्तों को जिला निर्वाचन अधिकारी नामजद किया जाता है। वे मतदान केंद्रो के लिए प्रेजाइडिंग अधिकारी तथा मतदान अधिकारी नियुक्ति करते हैें। प्रेजाइडिंग अधिकारी निर्वाचन के दिन महत्वपूर्ण भूमिका ​अदा करता है। मतदान केंद्र पर उसका सामान्य कर्तव्य वहां व्यवस्था बनाए रखना और यह देखना होता है कि मतदान निर्बाध और निष्पक्ष हो। मतदान अधिकारी का यह कर्तव्य होता है कि वह प्रेजाइडिंग अधिकारी की उसके कृत्यों के निर्वहन में सहायता करे। निर्वाचन आयोग, राज्य सरकार के परामर्श से प्रत्येक संसदीय तथा विधान निर्वाचन क्षेत्र के लिए राज्य सभा में किसी स्थान या किन्हीं स्थानों को भरने के लिए एक रिटर्निंग अधिकारी नियुक्ति करता है। रिटर्निंग ​अधिकारी को ऐसे सब कार्य करने का अधिकार प्राप्त है जो निर्वाचन विधियों के अनुसार निर्वाचन कराने के लिए आवश्यक हों।
(साभार—पुस्तक हमारी संसद लेखक श्री सुभाष कश्यप जी)

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