कुली के कलंक से आज मिली थी मुक्ति, सौ साल पहले बागेश्वर का सरयू बगड़ रहा था गवाह

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बागेश्वर। लाइव उत्तरांचल न्यूज


कुमाऊं में एक सौ साल पहले आज के दिन एक ऐतिहासिक घटना घटी थी। इससे समूचे समाज के सर से कुली का कलंक मिटा था। बागनाथ की नगरी से बहने वाली सरयू का किनारा यानि बगड़ इस का गवाह रहा। सरयू के जल से संकल्प के साथ ही तत्कालीन आंदोलित जन समुदाय ने कुली व्यवस्था के लिए बनाए गए रजिस्टर सरयू नदी में बहा दिए थे। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने तक इस अहिंसक आंदोलन की तारीफ की थी बल्कि 1929 में बागेश्वर आकर इस भूमि के दर्शन भी किए।


ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार गोरखा शासन काल से कुमाऊं में कुली बेगार व्यवस्था चली आ रही थी। गोरखों ने समाज में अग्रणी समझे जाने वाले पंडित वर्ग को भी इससे वंचित नहीं रखा था। कहावत है कि गोरखा शासकों से जब पंडितों को छूट देने की बात कही गई तो उनका रोचक जवाब था कि पंडितन को खुटा पुज्यन छन ख्वारा ना( पंडित के पैर पूजे जाते हैं सिर नहीं) यानि पंडितों को भी बगैर किसी मजदूरीू के शासन प्रशासन के नुमांदों को बोझा ढोना होगा। 1815 में आए अंग्रेजों ने कुमाऊं में शासन के दौरान व्यवस्था में अधिक तब्दीली नहीं की। थोकदार व पधानों( प्रधान नहीं) को स्थानीय स्तर पर व्यवस्था का जिम्मा दिया गया। वहीं पटवारी के तौर पर पुलिस की यहां के लिए अलग से सस्ती व्यवस्था की।


कुली बेगार व्यवस्था जिसको कुली बर्दायश व कुली उतार के माध्यम से पूरा करवाया जाता था को जारी रखा। लेकिन सत्ता के निचले स्तर में व्याप्त भ्रष्टाचार से आम जनता इससे तंग आ गई थी। भीतर ही भीतर पनप रही विरोध की ज्वाला को एक चिंगारी दिखाने की जरूरत थी।

इस बीच कुमाऊं परिषद नाम का सामाजिक संगठन वजूद में आने के साथ ही अंग्रेज सरकार के जन विरोधी नीतियों की मुखालफत करने लगा था। इसमें वरिष्ठ पत्रकार व जननेता शामिल थे। कुमाऊं परिषद का चौथा अधिवेशन 1920 दिसंबर में काशीपुर में हुआ। परिषद के शासन विरोधी रवैये से अंग्रेज हुकमरान भी वाकिफ थे। उन्होने जनता में अपने पक्ष के लोगों को परिषद में अहम स्थान दिलाने की कोशिश भी की।

बताते हैं कि यह चाल कामयाब नहीं हुई और अल्मोड़ा के वरिष्ठ कांग्रेस नेता हर गोविंद पंत परिषद के अध्यक्ष बनने में सफल रहे। इस अधिवेशन में शक्ति के संपादक कुमाऊं केशरी बद्री दत्त पांडे भी मौजूद थे। उन्होंने अन्य प्रस्तावों के अलावा विशेष तौर पर एक प्रस्ताव रखा। इसमें कहा गयाः- कुमाऊं नौकरशाही का दुर्ग है। यहां नौकरशाही ने सभी को कुली बना रखा है। सबसे पहले हमें कुमाऊं से माथे से कुली का कलंक हटाना है तभी हमारा देश आगे बढ़ सकता है। अध्यक्षता कर रहे हर गोविंद पंत ने कुमाऊं वासियों से राजनैतिक रूप से उदासीन रहने के बजाय सक्रियता बढ़ाने का आह्वान भी किया। इसके बाद कुमाऊं परिषद के नेता कांग्रेस के नागपुर में प्रस्तावित राष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लेने रवाना हुए।


बागेश्वर में ऐतिहासिक घटना का सूत्रपातः जानकारी के अऩुसार काशीपुर के 1920 दिसंबर में हुए इस अधिवेशन में बागेश्वर से भी जागरूक लोग शामिल हुए थे। इनमें शामिल चामी के शिव दत्त पांडे, राम दत्त व गरूड़ वज्यूला निवासी मोहन सिंह मेहता व केशव दत्त पांडे के अलावा नगर के श्याम लाल साह शामिल थे। उन्होंने पं बद्री दत्त पांडे व हरगोविंद पंत को समझाया कि जनवरी में उत्तरेणी का त्यौहार आ रहा है। बागेश्वर में इस दौरान काफी लोग जमा होते हैं। इसका फायदा उठा कर कुली बेगार के खिलाफ अंतिम बिगुल फूंका जा सकता है।

उनकी इस राय को स्वीकार करते हुए नेताओं ने नागपुर अधिवेशन के लौटने पर बागेश्वर आने का आश्वासन दिया। दस्तावेजों के अनुसार 10 जनवरी 1921 को हरगोविंद पंत, बद्री द्त्त पांडे व चेतराम सुनार सहित परिषद से जुड़े 50 कार्यकर्ता सोमेश्वर व गरु़ड़ घाटी होते हुए बागेश्वर को रवना हुए। पैदल यात्रा के दौरान उऩ्होंने कुली बेगार के विरोध में माहौल बनाने के लिए नुक्कड़ सभाएं की। अंततः 11 जनवरी 1921 को बागेश्वर पहुंचे।


कुली बेगार के अंत का विगुल फूंकाः बागेश्वर नगर में 1921 के 12 जनवरी को एक अजीव हलचल थी। उतरायणी कौतिक में इससे पहले केवल सरयू स्नान व बागनाथ व अऩ्य मंदिरों में लोग पूजा अर्चना करते दिखाई देते थे वहीं इस बार एक अलग माहौल था। बताते हैं कि इस तिथि को दोपहर बढ़ा जलूस निकाला गया। इसमें कुली उतार बंद करो जैसे नारे लगाए गए। स्वतंत्र भारत व महात्मा गांधी की जय के भी नारे लगाए गए। इस दौरान बद्री दत्त पांडे, हर गोविंद पंत, चेतराम व चिरंजीलाल के भाषण भी हुए। जलूस की समाप्ति पर सरयू बगड़ में बड़ी सभा हुई। लोगों ने कुली बेगार नहीं देने का संकल्प लिया। 13 जनवरी को पुनः सभा का आयोजन किया गया। इस सभा में बद्री दत्त पांडे ने अन्य बातों के अलावा दानपुर के वीरों की विश्व युद्ध में दिखाए गए वीरता व साहसपूर्ण योगदान को याद करते हुए वर्तमान आंदोलन में सक्रिय भागादारी के लिए आह्वान किया। लोगों ने फिर से कुली बेगार नहीं देने का संकल्प लेते हुए मालगुजारों व थोकदारों द्वारा रखे जाने वाले कुली संबंधि रजिस्टर सरयू में बहा दिए।


14 जनवरी 1921 के ऐतिहासिक दिन की शुरूआत तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर डायबिल से परिषद के नेताओं को तलब करने से हुई। बताते हैं कि पंत, पांडे व चिरंजीलाल को डाक बंगले में बुलाकर विरोध प्रदर्शन बंद करने के साथ ही बागेश्वर छोड़ने की चेतावनी तक दी । कमिश्नर ने कहा कि गौरखों के समय से चली आ रही व्यवस्था के एक रात में समाप्त नहीं किया जा सकता है। डिप्टी कमिश्नर अल्मोड़ा से आते समय अपने साथ 21 पुलिस अफसर, 25 सिपाही के अलावा 500 गोलियां भी लेकर पहुंचा था लेकिन इस्तेमाल करने की हिम्मत नहीं जुटा सका। नेतागण तो पवित्र सरयू के जल का संकल्प ले चुके थे। डाक बंगले में डिप्टी कमिश्नर के किसी बात का जवाब दिए बगैर वापस सभा स्थल पहुंचे। बताते हैं जहां बड़ी तादात में लोग उनका इंतजार कर रहे थे।


बद्री दत्त पांडे ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि जनता कुली प्रथा को हमेशा के लिए समाप्त करने का संकल्प से हटती है तो यहां मेरी लाश जाएगी। हर गोविंद पंत ने कहा कि जनता अटल है हमारा पूरा साथ है। इस मौके पर चिरंजीलाल, मोहन सिंह मेहता, रामदत्त, जीत सिंह व पुरूषोतम दत्त जोशी आदि ने भी विचार रखे। जनता ने दो हाथ उठा कर संकल्प दोहराया और एक बार फिर से सरयू नदी के पानी से संकल्प लेकर कुली बेगार नहीं देने के प्रति दृढ रहने का संकल्प लिया। इसके साथ ही कुमाऊं के सर से एक बड़ा कलंक हमेशा के लिए दूर हो गया। इसके बाद बिट्रिश सत्ता में शामिल रहे गढ़वाल में भी कुली बेगार प्रथा बंद हो गई थी।

One thought on “कुली के कलंक से आज मिली थी मुक्ति, सौ साल पहले बागेश्वर का सरयू बगड़ रहा था गवाह

  1. सच है दॄढ इच्छा शक्ति से ही संकल्प सिद्ध होते हैं।सभी महा नायकों को सादर नमन वंदन🙏 यह जानकारी देने के लिए उत्तरांचल न्यूज डॉट कॉम का दिक से आभार 🙏🙏

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