अनुपम है महाकाली का यह धाम, कुमाऊं रेजीमेंट की आराध्य देवी है मां हाटकालिका, पेशावर से गंगोलीहाट पैदल घंटी चढ़ाने पहुंचे थे जवान, जानकारी युक्त नीरज कुमार जोशी का आलेख

गंगोलीहाट। नीरज कुमार जोशी / लाइव उत्तरांचल न्यूज

maa haatkalika mandir

गंगोलीहाट स्थित मां हाटकालिका मंदिर मां बंगेश सुंदरी (पश्चिम बंगाल) की चेतन शक्ति के रुप में स्थापित हैं। साधकों के प्रयास से महाकाली माता यहां स्वंय की इच्छा से जागृत रुप में स्थापित हैं। मां के परमभक्त आचार्य शास्त्री हेम चंद्र उपाध्याय बताते हैं यूं तो मां की महिमा व स्वरुप वर्णनातीत, अचिंतनीय, कल्पनातीत व गुणातीत है। किसी भी रुप में उनका महिमा का वर्णन कर पाना लौकिक शक्तियों से संभव नहीं है। केवल मां की कृपा होने पर ही उनके स्वरुप व महिमा का वर्णन कर पाना संभव है। माता की कृपा से ही ब्रहमा, विष्णु व महेश सृष्टि संचालन कर रहे हैं (ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका। प्रणवाक्षर मध्ये ये तीनों एका)। महाकाली मां अखिल ब्रहमांड की असीम शक्ति पुंज हैं उन्हीं कृपा से अखिल ब्रहमांड चलायमान है। सभी प्राणियों के अंदर मां की शक्ति विराजमान है। उन्हीं की शक्ति का स्वरुप समझकर सभी प्राणियों का सम्मान करना चाहिए। महाकाली माता श्रीकाली, तारा, ​छिन्नमस्ता, शोडसी, भुवनेश्श्वरी, त्रिपुर भैरवी, धूमावती माता, बग्लामुखी माता, मातंगी माता व कमला माता के रुप में दस महाविद्याओं के रुप में स्थापित हैं। दशों दिशायें भी उनकी शक्ति से स्थापित हैं। हमारा शरीर भी माता की धरोहर है इसका उपयोग जनकल्याण के लिए कर माता को प्रसन्न करने का प्रयास करना चाहिए। देवभूमि उत्तराखण्ड में आदिशक्ति मां जगदम्बा की असीम कृपा रही है। यहीं कारण है यहां आदिशक्ति मां जगदम्बा विभिन्न स्वरुपों में जनकल्याण करती आ रही हैं। मां का ऐसा ही धाम है पिथौरागढ़ के गंगोलीहाट तहसील में मां हाटकालिका धाम। आज हम आपको मां के इस अनुपम धाम के बारे में बताने जा रहे हैं।

देवभूमि उत्तराखण्ड स्थित मंदिर अपने आप में कईं रहस्यों को समेटे हैं। सीमांत जनपद पिथौरागढ़ के गंगोलीहाट तहसील स्थित मां हाटकालिका धाम के महिमा बेहद निराली है। देवदार के वृक्षों से घिरा मंदिर परिसर बेहद रमणीय है। घंटों के सफर तय करने के बावजूद यहां पहुंचते ही असीम शांति का अनुभव मिलता है। जिला मुख्यालय से इसकी दूरी करीब 77 किमी है। स्कंद पुराण के मानसखंड में दारुकावन (गंगोलीहाट) स्थित देवी की महिमा का विस्तार से वर्णन किया गया है।

आदि गुरु शंकराचार्य ने की मंदिर की पुर्नस्थापना: छटी शताब्दी के अंत में भगवान शिव के अंशावतार माने जाने वाले आदि गुरु शंकराचार्य कूर्मांचल यानि (कुमाऊं) भ्रमण के दौरान यहां पहुंचे। उन्होंने इस मंदिर की पुर्नस्थापना की । मान्यता है कि देवी मां कभी—कभी रात्रि में कीर्ति—बागीश्श्वर महादेव को पुकारती थी। वह वाणी जिस किसी के कानों में पड़ती थी। वह तत्काल मृत्यु को प्राप्त हो जाता था। इसके चलते आसपास स्थित लोगों को पलायन शुरु हो गया वह मंदिर परिसर से दूर जाकर रहने लगे। आदि गुरु शंकराचार्य ने यहां शक्ति पीठ स्थित ज्वाला को सात तांबे के बर्तनों से ढककर उसे कीलित किया। मां के प्रसन्न् होने के बाद यह वहां से आवाजें सुनाई देनी बंद हो गई। उन्होंने ही अपने साथ दक्षिण भारत से आए रावल जाति के लोगों को यहां की पूजा व्यवस्था की जिम्मेदारी सौंपी। तब से रावल लोग यहां आकर बस गए और वह ही यहां पुजारी की व्यवस्था संभालते आ रहे हैं। हालांकि यजमान की भूमिका अगरोन गांव के पंत लोगों के पास है।


प्रत्येक रात्रि में सजती है मां की डोली, भाग्यशाली लोगों को ही होता है आभास

वरिष्ठ पत्रकार हरगोविंद रावल

गंगोलीहाट। मंदिर के पुजारी व वरिष्ठ पत्रकार हरगोविंद रावल बताते हैं कि प्रत्येक रात्रि मां की डोली सजकर भ्रमण को निकलती है। इस दौरान रणसिंघ, दमाऊ व सिंह गर्जन की मनोहर धुन के साथ माता के गण, आंण व बांण की सेना भी चलती है। उन्होंने बताया कि प्रत्यक्ष रुप में कई बार ऐसा भी देखा गया है कि रात्रि में मन्दिर के कपाट बन्द होते समय पुजारी देवी का बिस्तर लगाते है। और प्रातः काल बिस्तर पर सिलवटें देखने को मिलती है। इससे माता यहां आने वाले भक्तों को अपनी मौजदूगी का प्रत्यक्ष आर्शीवाद देती प्रतीत होती हैं

जान्हवी नौले में निकलने वाले गुप्त गंगा के जल से स्नान करती हैं मां
गंगोलीहाट। मंदिर के पुजारी व वरिष्ठ पत्रकार हरगोविंद रावल ने बताया कि मुख्य मार्ग से मंदिर की ओर जाने वाले पैदल मार्ग में जान्हवी नौला स्थित है। कहा जाता है कि शैल पर्वत से निकली गुप्त गंगा यहां पर निकलती है। इसी जल से मां को स्नान कराया जाता है। बताया जाता है कि इस नौले का निर्माण राजा रामचन्द्र देव की माता जान्हवी ने करवाया था। उन्ही के नाम पर प्रसिद्ध हुआ। सरयू व राम गंगा नदियों के मध्य स्थित होने के कारण इस क्षेत्र को पूर्वकाल में गंगावली कहा जाता था, जो बाद में गंगोली के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

सेनाध्यक्ष रहते हुए कईं बार मां के दर्शनों को पहुंचे जनरल बीसी जोशी, कुमाऊं रेजीमेंट की आराध्य देवी है मां हाटकालिका
गंगोलीहाट। थल सेनाध्यक्ष जनरल बीसी जोशी की मां हाटकालिका पर असीम श्रृद्धा थी। थल सेनाध्यक्ष रहते हुए वह कईं बार मां के दर्शनों को पहुंचे थे। कुमाऊं रेजीमेंट मां की आराध्य देवी के रुप में पूजा करते आ रहे हैं। पुजारी हरगोविंद रावल बताते हैं कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारतीय सेना का जहाज डूबने लगा। कुमाऊं रेजीमेंट के जवानों ने जैसी ही मां को याद किया उनका जहाज चमत्कारी रुप से किनारे लग गया। रेजीमेंट ने मां के इस मंदिर को आराध्य देवी की मान्यता देते हुए पूजन शुरु किया। प्रत्येक नवरात्रि में सेना यहां आकर पूजन करती है। देश व लोगों की रक्षा के लिए प्रार्थना करती है। सेना के अटूट विश्वास का प्रमाण से इस बात से लगाया जा सकता है तत्कालीन पेशावर से सैनिक हजारों किमी पैदल चलकर मां को घंटी चढ़ाने पहुंचे थे। यह घंटी आज भी सेना की असीम आस्था का प्रमाण स्वरुप मंदिर परिसर में मौजूद है।

अंतराष्ट्रीय मानचित्र पर लाने की मांग: मंदिर के पुजारी हरगोविंद रावल ने सरकार से मां की इस मंदिर को अंतराष्ट्रीय मानचित्र पर लाने की मांग की है। उन्होंने बताया कि प्रतिवर्ष हजारों की संख्या में देशी—विदेशी पर्यटक यहां मां के दर्शनों को पहुंचते हैं। यहां सुविधाओं में बढ़ोत्तरी होने से पर्यटन बढ़ेगा व स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिलेगा।

मां हाटकालिका का दर्शन पूजन समस्त मनवांछित कामनाओं को देने के साथ रोग, शोक, दरिद्रता व भय को दूर करने वाला हैं। मां के दर्शनों से पापों का नाश होता है और परम भक्ति का वरदान मिलता है। आप भी परिवार संग मां के इस पावन धाम में जरुर पधारें।
जय मां हाट कालिका


नोट: आलेख को उपलब्ध जानकारी के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। फिर भी मानवीय स्वभाववश ऋुटियां होना संभव है। कृपया अपने सुझाव 8979279711 या 9412403532 पर अवश्य भेंजे।
धन्यवाद
टीम लाइव उत्तरांचल न्यूज

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