आज है शारदीय नवरात्र का पहला दिन, अनन्य भाव से की गई भक्ति से प्रसन्न होती है आदि शक्ति मां जगदम्बा— आचार्य घनानंद कांडपाल, पूर्व प्रधानाचार्य

 नैनीताल। लाइव उत्तरांचल न्यूज

17 अक्तूबर 1 गते कार्तिक मास से नवरात्रि का शुभागमन आ गया है। दिनांक 24 अगस्त को अष्टमी व नवमी एक साथ है। 25 को विजयादशमी है। प्रकृति सदैव पृथ्वी लोक का संतुलन बनाने में कभी विचलित नहीं होती है। वर्तमान में कोरोना महामारी के इस संकट में पारस्परिक सम्मेलन एवं दूरी बनाये रखने में पुरुषोत्तम मास एवं श्राद्ध पक्ष का पूर्ण सहयोग रहा। जैसा राष्ट्र हित में सरकारी निर्देशों के पालन में मलमास का पूर्ण सहयोग रहा। श्राद्ध पक्ष में सभी यज्ञादि विवाह आदि कार्य नहीं किये जाते हैं तदन्तर अधिक मास मे भी विशेष पर्व मेले अथवा नये उत्सव संपन्न नहीं किये जाते हैं। जिसे किसी भी स्थान पर जन समूह की अधिकता का अभाव रहा है। इस वर्ष का अधिकमास शुभ सूचक बना हुआ है। इसे व्याधि रोग , महामारी काफी मात्रा में घटती जा रही है। अब नवरात्रि पक्ष में मां भगवती दुर्गा का आवाहन, स्मरण, पूजन लोगों की सुख —समृद्धि का सूचक है। इन दिनों संभवत: लोग नवरात्रि व्रत करते हुए आदि शक्ति देवी का मूल मंत्र का जप करें। इसे घरों में देश में सुख शांति समृद्धि में वृद्धि होगी:

रोगान शेषान पहंसि तुष्टा रूष्टा तु कामान् सकलानाभीष्टान्। त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्या श्रयतां प्रयान्ति। 

प्रथम मंत्र से शक्ति का ध्यान करते हुए नर्वाण मंत्र का जप करें।

नवरात्रि व्रत:— वर्षभर में दो बार नवरात्रि व्रत एवं पूजन होता है। इस प्रमादी नाम सम्वत्सर में प्रथम नवरात्र पूजा 25 मार्च 12 गते चैत्र शुक्ल पक्ष  से प्रारंभ हुई । दिनांक 3 अप्रैल 21 गते चैत्र को विजयादशमी के साथ संपन्न हुई। इस नवरात्रि  में अष्टमी तथा रामनवमी एवं दशमी नवरात्रि पारायण नाम से कही जाती है। इसी वर्ष में अशोज के महीने में दोबारा नवरात्र का समय जाना जाता है। किंतु अधिकमास होने से कार्तिक महीने में नवरात्र पूजन संपन्न हो रहा है। इसे आश्श्विन शुद्ध शुक्ल पक्ष पंचागों में गणना की गई है। कार्तिक महीना पुण्य मास कहा जाता है। जिसमें शिर्वाचन, विश्नुयाग, महालक्ष्मी, वैभव लक्ष्मी पूजन कार्य संपन्न होते हैं। भगवान कृष्ण को कार्तिक मास अ​त्यधिक प्रिय है।

 दामोदराय नभसि तुलायां दोलया स्रह। प्रदीपंते प्रयच्छामि नमोअंन्ताय वेधसे।। 

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इस वर्ष कार्तिक मास से प्रारंभ नवरात्रि पूजा धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष प्रदायिनी है। व्रत विधान: मां दुर्गा के नौ अवतारों का वर्णन किया है। आदि शक्ति ने समय—समय पर धर्म, मर्यादा एवं श्रृष्टि कल्याण के लिए अनेक अवतारों को प्रकट किया है जिनके अलग—अलग नाम हैं। इसमें प्रथम नवरात्रि को घर की सफाई स्वच्छता को विशेष ध्यान कर देवी मूर्ति (प्रतिमा) के सम्मुख  अखण्ड ज्योति जलाने का विधान है। इसे प्रधान दीप कहते हैं। जो साक्षात हरि स्वरुप है। विद्युत मालाओं को केवल प्रकाश मांत्र समझा जाय। चूंकि दीपक तेल या घी में प्रज्ज्वलित करने का विधान है जिसे दीपक पर दृष्टि पड़ने पर शरीर में ऊर्जा प्राप्त होती है। जो भक्ति की ओर ले जाती है।

 दीपोज्योति: परं ज्योति, दीपज्योति जनार्दन: दीपो हर्तु में पापं, दीप ज्योति नमोस्तुते।।

 तदन्तर मां की प्रतिमा को सभी श्रृंगारों को पहनाकर रोली अक्षत फूलमाला चढ़ाकर ध्यान करें। तदन्तर गणेश पूजन , मातृ`पूजन, नान्दी श्राद्ध, पुण्यावाचन, कलश स्थापना तथा नवग्रह पूजन के साथ दुर्गा सप्तशती का पाठ अवश्य करें। स्वंय करते हैें तो ठीक है अन्यथा पंडितों को बुलाकर पूजा पाठ करें। मन को शांत बनाये रखें। घर के सभी कार्य पूर्व की भांति करते हुए देवी का ध्यान अवश्य करें। मां दुर्गा की साक्षात प्रतिमाा सदैव हृदय में विराजमान रहे। सांयकाल आरती कर प्रसाद चढ़ाते हुए तब भोजन करने का विधान है। नवदुर्गा अवतार: ब्रह्मा जी ने मार्कण्डेय मुनि को यह संपूर्ण गोपनीय रहस्य का ज्ञान कराया। देवी की नौ मूर्तियों को नव दुर्गा कहते हैं। प्रथम नाम शैल पुत्री जो हिमालय राज को कईं वर्ष तपस्या परान्त पुत्री के रुप में प्राप्त हुई। पार्वती जिन्हें कहा जाता है। दूसरी मूर्ति का नाम ब्रह्मचारिणी है। ये ब्रह्म स्वभाव को प्राप्त कराने वाली देवी है। तीसरी मूर्ति चन्द्रघंटा नाम से प्रसिद्ध है। इनकी घंटा में चन्द्रमा स्थित होने से लोगों को आनंद प्रदान करने वाली है। कुष्मांडा चौथा अवतार है यह मनुष्य शरीर में व्याप्त बात, पित्त कफ इन रोगों को शांत करती हैं । पांचवी दुर्गा स्कंद माता कही जाती है। भगवती की शक्ति से परम बलशाली स्कंद का जन्म हुआ इसे स्कंदमाता कहा गया है। लोगों में ऊर्जा प्रदान करती हैं। छटा अवतार माता कात्यायनी देवी का है। देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिए मुनि कात्यायन के आश्रम में कन्या रुप में प्रकट हुई। विपत्त्तियों का नाश एवं संतति दायक देवी हैं। सातवां अवतार कालरात्रि नाम से है।  दुष्टों का संहार एवं शत्रुओं का नाश करने वाली धर्ममय देवी हैं। आठवीं मूर्ति महागौरी नाम से विख्यात है। गौर वर्ण होने से माहागौरी कहलाई। मनुष्य एवं स्त्रियों को चिर यौवना एवं सुंदर रुप प्रदान करने वाली देवी हैं। नवदुर्गा का नाम सिद्धदात्री है। संकट में फंसे हुये। रणभूमि में घिरे हुए, अग्न से भयभीत भयातुर लोगों को मुक्ति प्रदान करती हैं। इस अवतार को मोक्ष प्रदायनी देवी कहा जाता है। 

हरेला पूजन: जो लोग चाहें तो प्रथम नवरात्रि को देवी के नाम से हरेला बोने का भी विधान है। जिसमें पांच या सात अनाज के बीच बोये जाते हैं। सदैव दुर्गा स्प्तशती की पुस्तक पूजा स्थल पर रखें। पुस्तक का पूजन करना चाहिए। अष्टमी के दिन हरेले का पूजन कर मां भगवती को देवताओं के साथ हरेला चढ़ाना चाहिए। शक्ति मात उस हरेले से अत्यंत संतुष्ट होती है।

नवदुर्गा पूजन: नवें दिन एक बालक के साथ आठ कन्याएं अर्थात नौ अवतारों का पूजन करने का विधान हैं। इनमें बालक ‘बटुक’ अवतार कहा गया है। इन कन्याओं की उम्र 2 से 10 वर्ष तक होनी चाहिए।इन सबाके आसन में बैठाकर पैर धोकर चन्दन, अक्षत, फूलमाला, चुनरी प्रदान कर आरती करनी चाहिए। तब सर्वप्रथम एक—एक लड्डू या बताशा खिलाकर इनका खुस करना है। तदन्तर इन्हें पेट भर भोजन खिलाना चाहिए। कुमारी पूजन से सिंह वाहिनी प्रसन्न जगदम्बा प्रसन्न होती हैं। ध्यान रहे कलियुग या समय प्रभाव से सिंह वाहिनी जगदम्बा का साक्षात्कार कठिन है। ब्रह्मा, विष्णु, भगवान शंकर की साक्षात मूर्ति का दर्शन ​कठिन हो गया है। परंतु उनके अवतारों का दर्शन प्राप्त होता है। अनन्य एकाग्र भाव से ध्यान करने पर इन नौ अवतारों का दर्शन भी लोगों को प्राप्त होता है। जिसे मनुष्य धर्म, अर्थ, काम पूर्ण रुप से प्राप्त कर मोक्ष भी प्राप्त करते हैं। विजयादशमी: दिनांक 25 अक्तूबर को विजयादशमी व्रतों का परायण एवं हरेला पूजन संपन्न होने का दिन है। विजयादशमी को हवन आदि कार्य करने के उपरांत व्रतों का परायण, प्रसाद वितरण, हरेला धारण करना शास्त्र सम्मत है। दिनांक 24 अक्तूबर 8 गते कार्तिक को अष्टमी एवं नवमी दोनों एक साथ है। दिनांक 25 अक्तूबर 9 गते कार्तिक को विजयादशमी हो रही है दिनांक 30 अक्तूबर कोजागरी पूर्णिमा पर्व है जिसे शरद पूर्णिमा कहा जाता है। इस नवरात्रि पूजन में मां दुर्गा को रोली, चन्दन, अक्षत, फूल, कांजल, श्रृंगार, धूप, दीप, नारियल बतासे, फल, मुक्ता, मिठाई, दो वस्त्र आदि चढ़ाना श्रेष्ठ है। विल्व पत्र प्राप्त कर चढ़ाने चाहिए।

अमृतोद्धव श्री वृक्षो महादेवि प्रिय सदा। विल्वपत्रं प्रयच्छामि पविंत्र ते सुरेश्वरी।।

उक्त नवरात्रि में सभी लोगों को मां दुर्गा का ध्यान, पूजन, व्रतादि अवश्य करना चाहिए। इसे ही वर्तमान समय में मानव जीवन सुखी एवं समृद्धि कारक बनेगा। 

या देवी सर्वभूतेषु मातृरुपेण संस्थिता।नमस्तस्यै नमस्तस्यै, नमस्त्स्यै नमो नम:।।

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One thought on “आज है शारदीय नवरात्र का पहला दिन, अनन्य भाव से की गई भक्ति से प्रसन्न होती है आदि शक्ति मां जगदम्बा— आचार्य घनानंद कांडपाल, पूर्व प्रधानाचार्य

  1. बहुत बहुत बधाई आचार्य जी आप का मार्ग दर्शन करने के लिए

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