कल है पापमोचनी एकादशी, युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से व देवर्षि नारद ने सृष्टि रचयिता ब्रह्मा जी से सुनी थी इस व्रत की महिमा

नैनीताल। लाइव उत्तरांचल न्यूज

कल यानि बुधवार 7 अप्रैल को पापमोचनी एकादशी व्रत है। पुराणों में इस व्रत का विशेष महत्व बताया गया है। धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण व देवर्षि नारद ने ​अपने पिता सृष्टि रचयिता ब्रह्मा जी से इस व्रत का महत्व जाना था। हमारे सुधी पाठक पंडित प्रकाश जोशी ने जानकारी युक्ति यह आलेख हम तक भेजा है। हम इसे आप तक ससम्मान पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैें।

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एकादशी व्रत पापमोचनी का अर्थ है पाप हरने वाली, यह एकादशी चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को होती है। इस वर्ष यह सात अप्रैल को है। पुराणों में पापमोचनी एकादशी व्रत रखना बेहद फलदायी माना गया है। मान्यता है कि पापमोचनी एकादशी व्रत रखने से श्रीहरि की असीम कृपा प्राप्त होती है। इस कथा में भगवान श्रीकृष्ण और धर्मराज पांडव श्रेष्ठ युधिष्ठिर संवाद है। युधिष्ठिर पूछते हैं — हे जनार्दन चैत्र मास कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है, तथा इसकी क्या विधि है, कृपा करके आप मुझे बताये
इस पर भगवान बोले— हे राजन चैत्रमास एकादशी का नाम पापमोचनी एकादशी है। इसके व्रत के प्रभाव से मनुष्य के सभी पापों का नाश होता है। यह व्रत उत्तम व्रत है। इस पापमोचनी एकादशी के महात्म्य के श्रवण व पठन से समस्त पापों का नाश होता है। देवर्षि नारद ने भी अपने पिताब्रह्मा जी से भी इस व्रत के महत्व व​ विधि बताने का आग्रह किया था। इस पर ब्रह्मा जी ने कहा हे नारद चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी पापमोचनी एकादशी के रूप में मनाई जाती है। इस दिन भगवान विष्णु का पूजन किया जाता है। कथा के अनुसार चित्र रथ नामक एक रमणीक वन था, इस वन में देवराज इन्द्र गंधर्व कन्याओं तथा देवताओं सहित स्वच्छंद विहार करते थे। एक बार मेधावी नामक ऋषि भी वहाँ पर तपस्या कर रहे थे। वे तपस्वी ऋषि शिव उपासक थे इससे अप्सराएं द्वेष रखती थीं। एक बार कामदेव ने मुनि का तप भंग करने के लिए उनके पास मंजुघोषा नामक अप्सरा को भेजा। युवा अवस्था वाले मुनि कामदेव के प्रभाव अप्सरा के हाव—भाव नृत्य गीत तथा कटाक्षों पर काम मोहित हो गये। उन्हें रति क्रीडा करते हुए 57 वर्ष व्यतीत हो गये। इसी बीच एक दिन मंजुघोषा अप्सरा ने देवलोक जाने की आज्ञा मांगी। इस पर तपस्वी मुनि को आभास हुआ कि मुझे रसातल पंहुचाने का एक मात्र कारण अप्सरा मंजुघोषा हीं है। इस पर उन्होंने क्रोधित होकर मंजुघोषा को पिशाचिनी होने का श्राप दे दिया। श्राप सुनकर मंजुघोषा कांपते हुए ऋषि से मुक्ति का उपाय पूछने लगी। काफी क्षमा याचना करने के बाद मुनि ने अप्सरा को पापमोचनी एकादशी व्रत रखने का उपाय बताया। जब मुनि अपने पिता च्यवन ऋषि के आश्रम पंहुचे पुत्र के मुख से श्राप देने की बात सुनकर च्यवन ऋषि ने पुत्र पर नाराज हुए तथा उन्होंने उन्हें भी चैत्र कृष्ण एकादशी व्रत करने की आज्ञा दी। भगवान हरि की कृपा व व्रत के प्रभाव से मंजुघोषा पिशाचिनी देह से मुक्त होकर देवलोक चली गयी। ब्रह्मा जी कहते है अत: हे नारद जो कोई मनुष्य विधि पूर्वक इस व्रत का महात्म्य को पढता है और सुनता है उसे सारे संकटों से भी मुक्ति मिल जाती है।

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