स्वामी विवेकानन्द नैनीताल में नर्तकियों से मिले तो तूफान उठ गया, स्वामी जी की पुण्यतिथि पर विशेष जगदीश जोशी, वरिष्ठ पत्रकार , लाइव उत्तरांचल न्यूज नैनीताल

स्वामी विवेकानन्द ने देवभूमि उत्तराखंड से खासा लगाव रहा। अल्मोड़ा जिले के काकड़ीघाट में उन्हें पीपल के पेड़ के नीचे अणु में ब्रह्मांड के दर्शन हुए थे।  1902 को आज के दिन यानि 4 जुलाई को उन्होंने नश्वर शरीर का त्याग किया था।               

नयना  देवी में लगा बोर्ड

 अल्मोड़ा के अलावा सरोवर नगरी   नैनीताल  से भी उनके कई संस्मरण जुड़े हैं। नैनीताल में समाज में तिरस्कृत नर्तकियों से मिलने का प्रसंग इनमें एक है।स्वामी जी के इस कदम से तब समाज में तूफान मच गया था। स्वामी जी की शिष्या भगनी निवेदिता ने ‘स्वामी विवेकानन्द के साथ भ्रमण’ पुस्तक में  स्वयं इसका उल्लेख किया है।  भगनी निवेदिता लिखती हैं:-    ‘नर्तकियों से सम्बंधित घटना हमारे नैनीसरोवर के ऊपर स्थित दो मंदिरों के दर्शन करते समय हुई थी। ये दोनों मंदिर स्मरणातीत काल से ही तीर्थ का रूप लेकर सुंदर नैनीताल को पवित्र बनाए हुए है। यहां पूजा करते समय हमारी दो नर्तकियों से भेंट हुई। पूजा समाप्त कर के वे हमारे पास  आयीं। हम अपनी टूटी फूटी भाषा में उनके साथ वार्तालाप में लग गयीं। हमने उन्हें नगर की सम्मानित महिलाएँ समझा और बाद में स्वामी जी द्वारा उन्हें बहिष्कृत करने से इंकार कर देने पर वहां उपस्थित लोगों में जो तूफान मच गया था, उस पर हमें अत्यंत विषमय हुआ।’ वह आगे लिखती हैं कि खेतड़ी के राजा के यहां एक नर्तकी के प्रसंग के बाद स्वामी जी के विचार में परिवर्तन आया था। दरअसल खेतड़ी की नर्तकी के आमंत्रण पर स्वामी जी नाराज हो गए थे लेकिन बाद जब वे सभा में गए तो नर्तकी ने सूरदास का भजन प्रभु मेरे अवगुण चित ना धरो गाया था। निवेदिता लिखती हैं ‘तब स्वामी जी ने स्वयं बताया  कि इसके साथ ही उनकी आंखों से मानो एक पर्दा सा उठ गया। उन्होंने देखा कि सचमुच ही सब एक हैं। तब से उन्होंने किसी की भी निंदा करनी छोड़ दी और इस मंदिर से सम्बंधित घटना को जया ने किसी अन्य के मुख से सुना कि वक्ता ने जब समवेत महिलाओं के प्रति बिना किसी भेदभाव या तिरस्कार के अपनी शक्तिपूर्ण भाषा में स्नेह तथा कोमलतापूर्ण बातें कहीं, तो यहां उपस्थित सभी का हृदय आंदोलित हो उठा’ इधर श्री मां नयनादेवी मंदिर अमर उदय ट्रस्ट ने स्वामी जी से जुड़े प्रसंग को बकायदा बोर्ड लगाकर प्रदर्शित किया है। ट्रस्ट के अध्यक्ष वरिष्ठ पत्रकार राजीव लोचन साह कहते हैं कि यह प्रसंग स्वामी जी का उस दौर में महिलाओं के प्रति सद्भाव का परिचायक है।

काकड़ीघाट में हुए  ब्रह्मांड के दर्शन:-  काकड़ीघाट का स्वामी विवेकानंद के जीवन से गहरा संबंध है।  एक संन्यासी के तौर पर 1890 में कुमाऊं की पहली यात्रा पर आए स्वामी विवेकानंद को इसी स्थल पर आत्म ज्ञान मिला था। कहते हैं कि उन्हें एक अणु में ब्रह्मांड के दर्शन इसी स्थल पर हुए थे।    अल्मोड़ा जिले की सीमा में बसे खैरना व सुयलबाड़ी के बीच इस स्थल पर मौजूद पीपल के पेड़ के नीचे ध्यान मग्न विवेकानंद को यह अहसास हुआ था। उन्होंने स्वयं इसका जिक्र करते हुए कहा है कि उनकी जीवन की गूढ़ समस्या का समाधान काकड़ीघाट में आकर हुआ है। काकड़ीघाट में पहुंचने पर पीपल के पेड़े के नीचे उनकी समाधी लग गई। बताते हैं कि उनके शरीर में विशेष रूप से हलचल यानि सिहरन हुई और उन्हें परम ज्ञान की प्राप्ति हुई। काकड़ीघाट को इसके अनुरूप महत्व नहीं नहीं मिल सका है। पीपल का पेड़ अब सूख गया है। इस्का क्लोन बना कर पुनर्जीवित करने की कवायद चल रही है। स्वामी विवेकानंद ने   1890,  1897, 1898 तथा 1901 में कुमाऊं का दौरा किया है।

सुमित्रानन्दन पंत

जननि! नहीं चल सकते हैं?:-कविवर सुमित्रानन्दन पंत ने स्वामी जी के अल्मोड़ा आगमन को लेकर   बाल मन में उठे सवाल पर सुंदर कविता लिखी है:- 

“माँ! अल्मोड़े में आए थे जब राजर्षि विवेकानंद, तब मग में मखमल बिछवाया, दीपावलि की विपुल अमंद,  बिना पाँवड़े पथ में क्या वे जननि! नहीं चल सकते हैं? दीपावली क्यों की? क्या वे माँ! मंद दृष्टि कुछ रखते हैं?” “कृष्णे! स्वामी जी तो दुर्गम मग में चलते हैं निर्भय, दिव्य दृष्टि हैं, कितने ही पथ पार कर चुके कंटकमय,वह मखमल तो भक्तिभाव थे फैले जनता के मन के, स्वामी जी तो प्रभावान हैं वे प्रदीप थे पूजन के।”

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